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तमिल नाडु: राशन कार्ड के अभाव में कई आदिवासी परिवारों को नहीं मिल रही राहत

तमिलनाडु ट्राइबल एसोसिएशन के कोयंबत्तूर ज़िला अध्यक्ष वी.एस. परमशिवम कहते हैं कि वालपराई से क़रीब 40 किलोमीटर दूर कूमाटी आदिवासी बस्ती में 10 परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है. राशन कार्ड के अभाव में इन परिवारों को ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो लॉकडाउन के कारण हमेशा संभव नहीं है.

तमिलनाडु सरकार की COVID-19 राहत, जिसमें 4,000 रुपए और राशन शामिल हैं, कोयंबत्तूर ज़िले के कई आदिवासी परिवारों तक नहीं पहुंच पा रही क्योंकि उनके पास राशन कार्ड नहीं हैं.

अन्नामलई टाइगर रिज़र्व (एटीआर) क्षेत्रों की आदिवासी बस्तियों के मुखिया का दावा है कि कम से कम 10% परिवारों के पास इन लाभों को पाने के लिए राशन कार्ड नहीं है.

एटीआर की कोयंबत्तूर ज़िले की सीमा में 17 आदिवासी बस्तियां हैं. वन विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार यहां 986 परिवार हैं. हालांकि यह आंकड़े कई साल पुराने हैं, और अब इन परिवारों की संख्या 1,000 से ज़्यादा है.

तमिलनाडु ट्राइबल एसोसिएशन के कोयंबत्तूर ज़िला अध्यक्ष वी.एस. परमसशिवम का कहना है कि इनमें से लगभग 100 परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं हैं.

परमशिवम कहते हैं कि वालपराई से क़रीब 40 किलोमीटर दूर कूमाटी आदिवासी बस्ती में 10 परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं है. राशन कार्ड के अभाव में इन परिवारों को ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो लॉकडाउन के कारण हमेशा संभव नहीं है.

तमिलनाडु एकता परिषद ने आदिवासी बस्तियों के ऐसे परिवारों की सूची बनाई है जिनके पास राशन कार्ड नहीं है. सूची के अनुसार कुलीपट्टी, गोपालपति, मावडप्पू और कट्टुपट्टी बस्तियों के 51 परिवारों के पास राशन कार्ड नहीं हैं.

दूसरी मुश्किल यह है कि इन परिवारों में से कई को राशन कार्ड बनवाने की प्रक्रिया पता ही नहीं है. ऐसे में अधिकारियों को उनकी सहायता कर उन्हें राशन कार्ड, वोटर आईडी और आधार जैसे ज़रूरी दस्तावेज़ पाने में में मदद करनी चाहिए.

हालांकि ज़िला आपूर्ति अधिकारी आर कुमरेसन का दावा है कि ज़िले के ज़्यादातर आदिवासियों के पास राशन कार्ड है. विभाग ने इस साल जनवरी में एक शिविर आयोजित किया था, और विभाग मानता है कि सिर्फ़ ऐसे आदिवासी जिनकी उसके बाद शादी हुई, उनके पास राशन कार्ड नहीं हो सकता.

ज़ाहिर है सरकार का आदिवासियों के लिए सिर्फ़ घोषणा करना काफ़ी नहीं है, उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह के फ़ायदे उन आदिवासियों तक पहुंचें.

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