असम: आदिवासियों की ज़मीन की लूट, विरोध करने पर टूटा पुलिस का क़हर

आदिवासी किसानों का कहना है कि कंपनी दलालों के ज़रिए उन पर ज़मीन छोड़ देने का दबाव बना रही है. आदिवासियों का यह भी कहना है कि अफ़सोस इस बात का है कि प्रशासन पूरी तरह से कंपनी की धोखाधड़ी में शामिल है. प्रशासन की तरफ़ से कंपनी के ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ज़मीन हड़पने की सही ठहराने की कोशिश हो रही है.

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दिल्ली की सीमाओं पर किसान तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ डटे हुए हैं. ये किसान बड़ी प्राइवेट कंपनियों से अपनी ज़मीन और रोज़गार बचाने के लिए लड़ रहे हैं. इस मसले पर अपने-अपने नज़रिए से ख़बरें बन रही हैं, और चर्चा भी हो रही है. लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों में आदिवासियों की ज़मीनें छीन कर प्राइवेट कंपनियों को देने का सिलसिला बदस्तूर चल रहा है. इस सिलसिले के रास्ते में आने वाले आदिवासियों पर पुलिस का क़हर टूटता है. ऐसा ही एक मामला असम के नागांव ज़िले में चल रहा है.

असम के नागांव ज़िले में एक पावर कंपनी (Azure Power) आदिवासियों की ज़मीन हड़पने की कोशिश में लगी है. यह कंपनी इस ज़मीन पर सोलर पावर प्लांट लगाना चाहती है. यहाँ के आदिवासी और किसान ग़ैरक़ानूनी तरीक़े और धोखे से उनकी ज़मीनें हड़पे जाने का विरोध कर रहे हैं. इस पूरे मामले में स्थानीय प्रशासन और पुलिस पूरी तरह से कंपनी के पक्ष में हैं. अपनी ज़मीनों को बचाने के लिए प्रदर्शन करने वाले आदिवासियों और किसानों पर पुलिस ने क्रूरता दिखाई है. 

प्रतीकात्मक फ़ोटो

29 दिसंबर 2020 को कंपनी ने ज़बरदस्ती इस ज़मीन पर निर्माण शुरू किया तो आदिवासियों ने इसका विरोध किया. पुलिस ने विरोध कर रहे आदिवासियों, जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं, पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाईं. पुलिस एक्शन में कई आदिवासियों को गहरी और गंभीर चोटें आई थीं. कंपनी का दावा है कि उसने यहाँ कि 276 बीघा ज़मीन पूर्व ज़मींदार परिवार से ख़रीदी है. हालाँकि इस ख़रीद को कोर्ट में चुनौती दी गई है, और मामला अभी कोर्ट में लंबित है. 

यहाँ के आदिवासी किसानों का कहना है कि कंपनी दलालों के ज़रिए उन पर ज़मीन छोड़ देने का दबाव बना रही है. आदिवासियों का यह भी कहना है कि अफ़सोस इस बात का है कि प्रशासन पूरी तरह से कंपनी की धोखाधड़ी में शामिल है. प्रशासन की तरफ़ से कंपनी के ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ज़मीन हड़पने को सही ठहराने की कोशिश हो रही है. इस कोशिश में प्रशासन ग़लत तथ्यों के साथ क़ानून की भी ग़लत व्याख्या कर रहा है. आदिवासियों का कहना है कि प्रशासन कंपनी के लिए ज़मीन हासिल करने के लिए किसानों और आदिवासियों के अधिकारों को नकारने का हर हथकंडा अपना रहा है. 

आदिवासियों का कहना है कि प्रशासन के तर्कों का खोखलापन और झूठ साफ़-साफ़ समझा जा सकता है. आदिवासियों का कहना है कि कंपनी ने बेशक पूर्व ज़मींदार परिवार से सौदा कर ज़मीन के काग़ज़ात हासिल कर लिए हैं, लेकिन असम टेनेंसी एक्ट, 1971 ( Assam (Temporarily Settled Areas) Tenancy Act 1971) के तहत इस ज़मीन पर खेती करने वाले का अधिकार माना गया है. यह ज़मीन सिर्फ़ खेती के लिए ही किसी दूसरे को दी जा सकती है. आदिवासियों का कहना है कि वो पीढ़ी दर पीढ़ी इस ज़मीन पर खेती करते रहे हैं. जबकि प्रशासन यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि इस ज़मीन पर खेती हो ही नहीं रही है. 

इस इलाक़े और असम में लैंड राइट्स को समझने वाले लोगों का कहना है कि असम में लैंड राइट्स का मुद्दा बेहद पेचीदा है. असम के कई इलाक़ों में ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़े क़ानूनों में अभी भी स्पष्टता नहीं है. लेकिन वो भी ये मानते हैं कि इस इलाक़े में आदिवासी और दूसरे समुदाय के किसान कई दशकों से खेती करते रहे हैं. इस लिहाज़ से इन आदिवासियों और किसानों का इस ज़मीन पर क़ानूनी दावा बनता है. 

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