तेलंगाना के इस आदिवासी गांव की हर दीवार कुछ कहती है

गांव में बनाए गए सभी चित्र आदिवासियों और प्रकृति के बीच संबंध को दर्शाते हैं.

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तेलंगाना के कुमरंभीम-आसिफाबाद जिले में जैनूर ब्लॉक मुख्यालय से महज़ नौ किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा आदिवासी गांव है, जो आजकल सुर्खियों में है. मात्र 9.33 वर्ग किलोमीटर में फैला, मारलवई गांव पिछले कुछ महीनों से पूरे ज़िले के लोगों को आकर्षित कर रहा है. इसकी वजह है स्थानीय निवासियों द्वारा अपने घरों की दीवारों की गई चित्रकारी.

आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा को दर्शाने वाले यह दीवार चित्र, सिर्फ़ आम जनता को ही नहीं बल्कि ज़िले के निर्वाचित प्रतिनिधियों का ध्यान भी खींच रहे हैं.

यहां के सरपंच कनक प्रतिभा वेंकटेश्वर राव का कहना है कि उन्होंने आदिवासी संस्कृति और परंपरा की विशेषताओं के बारे में आने वाली पीढ़ियों को बताने के लिए ही गांव के घरों, पंचायत भवन और स्कूलों की दीवारों को ऐसे चित्रों से सजाने का फैसला किया. उन्होंने न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “शहरी इलाक़ों में रहने वाले हमारे आदिवासी युवाओं को अपनी जड़ों से वाकिफ़ होना चाहिए. इस पहल के पीछे यही सबसे बड़ी वजह है.”

गांव में बनाए गए सभी चित्र आदिवासियों और प्रकृति के बीच संबंध को दर्शाते हैं. मसलन गांव की पानी की टंकी पर एक घने पेड़ का चित्र बना है. इस पेड़ की जड़ें गाँव के बीचों-बीच पहुँचती हैं, और इसे एक ऐसी जगह के तौर पर दर्शाया गया है जहाँ जलीय और स्थलीय दोनों तरह के जानवर एक साथ रहते हैं.

गांव की पानी की टंकी

इसके अलावा स्थानीय निवासियों ने गांव में अलग-अलग जगहों पर बांस से बनी ईको फ्रेंडली कुर्सियां भी रखी हैं. स्थानीय अधिकारियों का मानना है कि इससे कई आदिवासियों को रोज़गार मिला है.

इन आदिवासियों की पहल की जानकारी मिलने पर  जिला प्रशासन की वास्तुकला विंग की एक टीम ने मारलवई का दौरा किया और इसे और विकसित करने के लिए इलाक़े का निरीक्षण किया.

अब स्थानीय निवासी, अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि इस छोटे से आदिवासी गाँव को उसकी उचित पहचान दिलाने के लिए जिला प्रशासन से सहायता का इंतज़ार कर रहे हैं.

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