अनूठा प्रयोग: गुल्लक तोड़ो तो शब्द बिखरते हैं और आदिवासी भाषा महकती है

भाषा की इस गुल्लक में छात्र अपनी आदिवासी भाषा के शब्दों को अंग्रेजी या तमिल में एक पेपर पर लिखते हैं और इसमें डाल सकते हैं. स्कूल में 35 इरुला और कुरुम्बा आदिवासी छात्र पढ़ रहे हैं.

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सोचिए अगर ऐसी गुल्लक होती जिसमें पैसों की जगह भाषा को बचाया जाता. क्या ऐसी कोई गुल्लक हो सकती है जिसमें शब्दों को जमा कर, उन भाषाओं को बचा लिया जाए जो कभी भी लुप्त हो सकती हैं. अब एक ऐसी ही पहल तमिलनाडु के आदिवासी इलाक़ों में हो रही है.

यहां पर लुप्तप्राय आदिवासी भाषाओं को बचाने का एक अनूठा प्रयोग किया जा रहा है. यह प्रयोग ख़ासकर ऐसी भाषाएं के लिए हो रहा है जिनकी कोई लिपि नहीं है. उन भाषाओं को बचाने की कोशिश में तमिल नाडु के नीलगिरी जिले के एक गांव के स्कूल में यह प्रयोग शुरू हुआ है.

यह स्कूल कोटगिरी के पास सेम्मनारई गांव में एक आदिवासी आवासीय विद्यालय (Tribal Residential School) है जहां पर मएक ‘भाषा बॉक्स’ (Language Box) स्थापित किया गया है.

भाषा की इस गुल्लक में छात्र अपनी आदिवासी भाषा के शब्दों को अंग्रेजी या तमिल में एक पेपर पर लिखते हैं और इसमें डाल सकते हैं. स्कूल में 35 इरुला और कुरुम्बा आदिवासी छात्र पढ़ रहे हैं.

ओडियन लक्ष्मणन, जो एक लेखक और इरुला गीतों के संग्रहकर्ता हैं, पिछले कुछ सालों से आदिवासी बच्चों के लिए ‘रीडिंग एंड लैंग्वेज रिट्रीवल मूवमेंट’ (Reading and Language Retrieval Movement) का नेतृत्व कर रहे हैं. ‘भाषा बॉक्स’ भी लक्ष्मणन का ही आइडिया है.

इस पहल के पीछे की सोच को समझाते हुए वो बताते हैं कि अधिकांश आदिवासी भाषाओं की कोई लिपि तो नहीं है, लेकिन फिर भी उनकी एक महान मौखिक परंपरा है. उन्हें उम्मीद है कि भाषा बॉक्स से छात्रों में अपनी भाषा के लिए प्रति गर्व की भावना पैदा होगी, और आदिवासी बच्चे अपनी मातृभाषा को बेहतर समझ सकेंगे, और बेहतर उच्चारण कर सकेंगे.

भाषा बॉक्स को हर छह महीने में खोला जाएगा, और इसमें योगदान देने वाले छात्रों को सम्मानित भी किया जाएगा. इसके बाद इन शब्दों को संकलित करके एक किताब लाने की योजना है.

नीलगिरी ज़िले में आठ आदिम आदिवासी समूह टोडा हैं – कोटा, इरुला, आलू कुरुम्बा, बेट्टा कुरुम्बा, मुल्लू कुरुबा, पनिया और कट्टुनायकर. इन सब आदिवासी समुदायों की अपनी अलग भाषा है. वो अपनी भाषाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी कहानियों, इतिहास गाथाओं, गीतों और कहावतों के ज़रिए आगे बढ़ाते हैं. इन आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा के कई पहलू हैं, जिन्हें उनकी अपनी भाषा में ही व्यक्त किया जा सकता है.

अनूठी पहल के फ़ायदे

भाषा बॉक्स में अपनी भाषा से जुड़े शब्द डालना और उसके लिए इनाम पाना बच्चों के लिए दोहरा फ़ायदा लेकर आएगा. एक तो उन्हें अपनी मातृभाषा पर गर्व होगा, दूसरा एक ऐसे समय पर जब इन भाषाओं को बेलने समझने वाले लोग दिन-ब-दिन कम होते जा रहे हैं, यह बच्चे अपनी भाषा और उसके इतिहास के प्रति जागरुक होंगे. उन्हें इसके इस्तेमाल और प्रसार के लिए जब इंसेंटिव मिलेगा, तो ज़ाहिर है यह बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा शब्दों को सीखने के लिए उत्साहित होंगे.

अगर मातृ भाषा में पढ़ाया जाता है, तो न सिर्फ़ उस भाषा का विकास होगा, बल्कि बच्चों को भी समझने में आसानी होगी

विलुप्त होती आदिवासी भाषाएं

यह माना जाता है कि जब कोई भाषा मर जाती है, या मरने के कगार पर होती है, तो उसके साथ उससे जुड़ी दुनिया को देखने का एक तरीका भी गायब हो जाता है.

यूनेस्को (UNESCO) के अनुसार, 10,000 से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली कोई भी भाषाओं पर विलुप्त होने का ख़तरा है.

संगठन कहता है कि कोई भाषा तब मर जाती है जब उसे बोलने वाला कोई नहीं बचता, न ही वो भाषा किसी को याद होती है. इस मानदंड से यूनेस्को ने भारत की 42 भाषाओं संकटग्रस्त कहा है.

1971 की जनगणना के बाद, भारत सरकार ने फैसला किया था कि 10,000 से कम लोगों द्वारा बोली जाने वाली किसी भी भाषा को भाषाओं की आधिकारिक सूची में शामिल करने की ज़रूरत नहीं है.

एक सर्वे में पाया गया है कि भारत में लगभग 780 भाषाएँ हैं, जिनमें से क़रीब 600 पर विलुप्त होने का ख़तरा (potentially endangered) है. 1991 और 2001 की जनगणना में 122 से ज़्यादा भाषाएँ दर्ज नहीं की गई हैं, ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि बाकी की सभी भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं.

इन 600 भाषाओं में एक बड़ी तादाद आदिवासी भाषाओं की है. इनमें पौड़ी, कोरकू, हल्दी, मावची, मोरन, तांगसा, ऐटन जैसी भाषाएं शामिल हैं.

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 60 सालों में भारत में लगभग 250 भाषाएँ लुप्त हो गई हैं. कभी देश के कुछ हिस्सें में अधुनी, दीची, घल्लू, हेल्गो, कटगी नाम की भाषाएं हुआ करती थीं. अंडमान में बो भाषा 2010 में गायब हो गई, और सिक्किम में मांझी भाषा 2015 में.

इन भाषाओं को बचाने के बारे में सोचने से पहले यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि कोई भी भाषा अचानक ग़ायब नहीं होगी. दरअसल, भाषा सिर्फ़ बोलचाल के लिए नहीं होगी, बल्कि किसी समाज की पूरी जीवनशैली को जोड़ कर रखती है. और इसका पतन परत-दर-परत धीरे-धीरे होता है. शायद इसीलिए इनको बचाना आसान भी हो सकता है, अगर यह बचाव कार्य समय रहते शुरू किया जाए.

क्यों खो रही हैं आदिवासी भाषाएं?

पलायन (migration), आदिवासी भाषाओं को मान्यता की कमी, घटती जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक कारण इन भाषाओं को हाशिए पर धकेल रहे हैं. आदिवासियों को मुख्यधार में सम्मिलित करने की कोशिश सरकारें करती रही हैं.

लेकिन आदिवासियों को मुख्यधार में जोड़ने की कोशिश में सरकारें जो बात भूल जाती हैं, वो यह कि उनकी संस्कृति, उनकी परंपरा, उनकी जीवनशैली और भाषा को संजो कर रखने की पहल बेहद अहम है.

आदिवासी बच्चों को दूसरी भाषा सीखने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश में समाज उन्हें  उनकी मातृभाषा भूलने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है.

किसी भाषा के हाशिए पर चले जाने के पीछे कुछ वजहें होती हैं.

·      किसी समूह का सामाजिक दबदबा उस समूह की भाषा को समाज में ज़्यादा लोकप्रिय बनाता है. मसलन, प्राचीन भारत में संस्कृत बोलने वालों के सामाजिक वर्चस्व ने उस भाषा को लोकप्रिय बनाया था.

·      जब कोई भाषा बाज़ार और आपके पेशे में ज़्यादा उपयोगी बन जाती है, तो उस भाषा की तरफ़ लोग खुद-ब-खुद खिंचे चले आते हैं. हम खुद भी घर पर अपनी मातृभाषा बोलते हैं, ऑफ़िस में अंग्रेज़ी, और बाज़ार में शायद हिंदी. ऐसे में जब आदिवासियों का मुख्यधारा के समाज से मेलजोल बढ़ता है, तो अपनी भाषा का महत्व उसकी खुद की नज़र में गिरने लगता है.

आदिवासी भाषाओं को कैसे बचाया जाए?

National Education Policy, 2020 मातृ भाषा में पढ़ाई पर ख़ास ज़ोर देता है. हम भी मानते हैं कि अगर मातृ भाषा में पढ़ाया जाता है, तो न सिर्फ़ उस भाषा का विकास होगा, बल्कि बच्चों को भी समझने में आसानी होगी.

लेकिन यह भी सच है कि आदिवासी बच्चों को उनकी मातृ भाषा में पढ़ाना आसान नहीं है. यह हम पहले भी कह चुके हैं कि ज़्यादातर आदिवासी भाषाओं की कोई लिपि या स्क्रिप्ट नहीं होती. इसलिए इन भाषाओं में किताबें प्रकाशित नहीं होती हैं. इसके अलावा आदिवासी भाषाओं को समझने वाले शिक्षक मिलना भी एक बड़ी चुनौती रहती है.

भाषाविद Gail Coelho

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा चुकीं भाषाविद गेल कोल्हो (Gail Coelho) आजकल बेट्टा कुरूंबा आदिवासियों पर काम कर रही हैं. वो कहती हैं कि भारत एक बहु भाषी देश है, यह सच्चाई है और इस सच्चाई को स्वीकार करने की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि आदिवासी बच्चों को एक से ज़्यादाल भाषा सीखनी ही पड़ती है. मसलन तमिलनाडु की भाषा तमिल है और स्कूल की किताबें भी तमिल में ही छपती हैं. उसी तरह से केरल में किताबें मलयालम में छपती हैं.

लेकिन आदिवासी बच्चों की दिक़्क़त ये है कि यह उनकी भाषा नहीं है. वो घर पर अपनी दूसरी भाषा बोलते हैं, और कई बार वे तमिल, मलयालम या फिर राज्य में बोली जाने वाली दूसरी भाषाओं को समझ नहीं पाते हैं. इसलिए अगर स्कूलों में उनकी भाषा में पढ़ाई होगी तो अच्छा होगा. इसका एक फ़ायदा यह होगी कि आदिवासी बच्चे अपनी भाषा के अलावा एक और भाषा सीखेंगे, जो उनके लिए भविष्य में फ़ायदेमंद होगा.

गेल कोल्हो मानती हैं कि आदिवासी भाषाओं में पढ़ाने का फ़ैसला स्वागत योग्य है. लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि अगर आदिवासी बच्चों को उनकी भाषा में पढ़ाना है, तो इसके लिए ठोस नीति बनाने की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि अब तक कई आदिवासी भाषाओं कि लिपि तैयार हुई है. इसी तरह से बाक़ी आदिवासी भाषाओं की लिपि भी तैयार हो सकती है. लेकिन अफ़सोस की आदिवासी भाषाओं के विकास, संरक्षण और शोध पर जितना पैसा ख़र्च करना चाहिए वह नहीं हो रहा है.

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