कर्नाटक ने आदिवासी गांवों में भी #HarGharTiranga

अधिकारियों के प्रयास से घने जंगलों के अंदर बसे सैकड़ों आदिवासी घरों में इस साल झंडे फहराए जा रहे हैं. अब इसी तरह से आदिवासियों को उनके अधिकार भी दे दिए जाते, तो अच्छा होता.

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जब पूरे देश में हर घर तिरंगा की गूंज है, तो देश के कई ऐसे इलाक़े भी हैं जहां न तो यह नारा पहुंचा है, न ही फ़हराने के लिए तिरंगा. भारत के हर राज्य में कई ऐसी दुर्गम आदिवासी बस्तियां है जहां के निवासियों ने शायद कई सालों से तिरांगा देखा भी न हो.

ऐसी ही कुछ आदिवासी बस्तियां हैं कर्नाटक की जोइदा तालुक में. यहां की सुदूर आदिवासी बस्तियों में से एक के निवासी, 80 साल की बाबू को याद भी नहीं कि उन्होंने पिछली बार तिरंगा कब देखा था. तो ज़ाहिर है जब पंचायत सदस्यों की एक टीम तिरंगा लेकर उनके दरवाजे पर दस्तक देने आई तो वह हैरान रह गए.

बाबू की तरह इस साल राष्ट्रीय ध्वज प्राप्त करने वाले वह अकेले आदिवासी नहीं हैं. अधिकारियों के प्रयास से घने जंगलों के अंदर बसे सैकड़ों आदिवासी घरों में इस साल झंडे फहराए जा रहे हैं.

पंचायतों और कर्नाटक वन विभाग के अधिकारियों ने भारी बारिश के बावजूद तिरंगे को हर घर तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत की है. जोइदा तालुक में कई छोटे गाँव हैं जिनमें स्कूल या सरकारी कार्यालय नहीं हैं. साथ ही, यहां की आबादी ज़्यादातर बुजुर्गों की है, जो न तो अपने घरों से बाहर निकलते हैं और न ही उनके घर में टीवी होता है. इसका मतलब यह है कि उन्होंने की सालों से तिरंगा नहीं देखा है, और न ही वो #HarGharTiranga के नारे से वाकिफ़ हैं.

बजरकुंग पंचायत यहां सबसे बड़ी पंचायतों में से एक है जिसके सैकड़ों घर घने जंगल के विभिन्न कोनों में स्थित हैं. पंचायत सदस्यों ने हर घर तिरंगा अभियान से एक हफ़्ते पहले एक डीटेल्ड योजना तैयार कर झण्डा बांटना शुरू किया. और इसके लिए पंचायत सदस्यों का हाथ बंटाने के लिए विपक्ष के लोग भी शामिल हुए.

“चूंकि अभियान की योजना जल्दी बन गई थी, हम उन घरों तक पहुँच सकते थे जहां तक कभी-कभी बारिश के दौरान पहुंचना आसान नहीं होता. नदी और नाले उफान पर होने की वजह से एक टीम को डिग्गी गांव के पास से लौटना पड़ा. हमने दो दिन बाद वहां झंडा फहराया, जब पानी घट गया,” एक पंचायत सदस्य ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा.

काली टाइगर रिजर्व में कुंबरवाड़ा वन्यजीव विभाग के कर्मचारियों ने भी मदद की. आरएफओ शशिधर पाटिल ने कहा कि अवैध शिकार विरोधी शिविरों में तैनात वन कर्मचारियों ने सुनिश्चित किया कि झंडे हर गांव तक पहुंचें.

“हमने अपने घरों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बारे में सुना था, लेकिन हमें उम्मीद नहीं थी कि लोग आएंगे और झंडा फहराएंगे. हम अगले साल के लिए झंडों को सहेज कर रखेंगे,” डिग्गी के पास रहने वाले एक आदिवासी ग्रामीण ने कहा.

हमें बस एक बात कहनी है. जिस तरह से हर घर तिरंगा पहुंचाया गया है, उसी तरह आदिवासियों को उनके अधिकार भी दे दिए जाते तो अच्छा होता.

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