कई आदिवासी-बहुल जिलों में कोविड-19 टीकाकरण कवरेज क्यों है पीछे

उत्तर पूर्व के बाहर जिन राज्यों में अनुसूचित जनजातियों की पर्याप्त आबादी है वो हैं छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, जहां अन्य ग्रामीण या शहरी जिलों की तुलना में आदिवासी क्षेत्रों में टीकाकरण कवरेज कम है. लेकिन यह उत्तर पूर्व के आदिवासी जिलों से बेहतर है.

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भारत ने नवंबर के पहले सप्ताह तक अपनी 76 फीसदी 18+ आबादी को कोविड-19 वैक्सीन की पहली खुराक दे दी है. लेकिन देश के 48 जिले वैक्सीन की पहली खुराक के कवरेज के मामले में अभी तक आधे रास्ते तक भी नहीं पहुंचे हैं.

इनमें से भी आधे जिले आदिवासी बहुल हैं. उनमें से बीस पूर्वोत्तर राज्यों नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय में स्थित हैं.

जनजातीय मामलों के मंत्रालय के मुताबिक अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत समुदाय भारत के 558 जिलों में रहते हैं. वहीं आदिवासी इलाक़ों में स्वास्थ्य देखभाल का अध्ययन करने वाले एक विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के मुताबिक 90 जिलों में उनकी आधी से ज़्यादा आबादी है. इन 90 जिलों में से 24 कम टीकाकरण कवरेज वाले केंद्र द्वारा चिन्हित 48 जिलों की सूची में आते हैं.

टीकाकरण पंजीकरण के लिए सरकारी पोर्टल CoWIN के आंकड़ों के मुताबिक भारत भर के आदिवासी-बहुल जिलों में मणिपुर के सेनापति में वैक्सीन की दूसरी खुराक कवरेज सबसे कम है. 6 नवंबर तक इसकी आबादी के सिर्फ 3.8 फीसदी लोगों को ही कोविड-19 वैक्सीन की दूसरी खुराक मिली थी. उदाहरण के लिए उस दिन पूरे जिले में वैक्सीन की सिर्फ 78 खुराक दी गई थी.

Scroll.in के मुताबिक कम वैक्सीन कवरेज की रिपोर्ट करने वाले अन्य जिलों में अरुणाचल प्रदेश में कुरुंग कुमे, मणिपुर में उखरूल और तामेंगलोंग, मेघालय में पूर्वी गारो हिल्स और नागालैंड में किफिरे शामिल हैं. पूर्वोत्तर के बाहर सबसे कम टीकाकरण कवरेज झारखंड के गुमला और छत्तीसगढ़ के नारायणपुर के आदिवासी इलाक़ों में है.

कोविड-19 की दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने के तुरंत बाद उत्तर पूर्व के अधिकांश आदिवासी जिलों में जून और जुलाई में टीकाकरण में वृद्धि देखी गई थी. लेकिन अगस्त से टीकाकरण कम होने लगा.

असम में स्थित एक नॉन-प्रॉफ़िट, एक्शन नॉर्थईस्ट ट्रस्ट चलाने वाले डॉ सुनील कौल ने कहा कि कुछ शहरी इलाक़ों के अलावा ज़्यादातर उत्तर पूर्व में कम आबादी है और मुश्किल से कुछ ही कोविड-19 मामले देखे गए हैं. उन्होंने कहा कि ज्यादातर शहरी इलाक़ों में कोविड-19 के मामले हुए, और यही वजह है कि टीकों की मांग कम हो गई है.

सुनील कौल ने यही भी कहा, “मार्च और अप्रैल में सरकार का दबाव था इसलिए लोगों ने टीका लगाया. लेकिन अब वह दबाव कम हो गया है.”

लेकिन यह सिर्फ वैक्सीन के मांग की कमी नहीं है. नागालैंड के एक कार्यकर्ता गुगु हरालू ने कम टीकाकरण कवरेज के लिए स्वास्थ्य प्रणाली के प्रति अविश्वास और टीकों के बारे में गलत धारणाओं को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि कुछ धार्मिक नेताओं ने लोगों को टीकाकरण के खिलाफ सलाह दी जिससे टीके की झिझक बढ़ गई.

उत्तर पूर्व के बाहर जिन राज्यों में अनुसूचित जनजातियों की पर्याप्त आबादी है वो हैं छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, जहां अन्य ग्रामीण या शहरी जिलों की तुलना में आदिवासी क्षेत्रों में टीकाकरण कवरेज कम है. लेकिन यह उत्तर पूर्व के आदिवासी जिलों से बेहतर है.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ के निदेशक डॉ दिलीप मावलंकर ने Scroll.in को बताया, “जून और जुलाई में स्पाइक इसलिए हो सकता है क्योंकि टीकाकरण के लिए विरोध कुछ हद तक टूट गया था और आदिवासी लोगों ने विरोध बंद करने का फैसला किया था.”

उन्होंने कहा कि भारत भर में कोविड-19 मामलों में गिरावट ने टीकाकरण की ज़रूरत को भी कम कर दिया.

डेटा दिलीप मावलंकर के तर्क के समर्थन में कुछ सबूत पेश करता है. Scroll.in ने 24 जिलों में 13 से 15 सितंबर, और 5 से 6 नवंबर के बीच 50 दिनों के अंतराल के साथ पहली और दूसरी खुराक कवरेज के नंबरों की जांच की. जबकि 50 दिनों में जिलों में दूसरी खुराक कवरेज में सुधार हुआ पहली खुराक कवरेज लगभग स्थिर रही. इससे पता चलता है कि जिन लोगों को अपनी पहली खुराक मिली थी, वो दूसरी खुराक के लिए लेने जा रहे थे. लेकिन एक नया पूल टीका लगाने के लिए नहीं आ रहा था.

कम स्टॉक और शुरुआती दिनों में कम जागरूकता

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि आदिवासी बहुल जिले टीकाकरण के मामले में दूसरे जिलों से पीछे हैं.

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक नॉन-प्रॉफ़िट संस्था SEARCH के संस्थापक और जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा गठित स्वास्थ्य विशेषज्ञ समूह के अध्यक्ष डॉ अभय बंग ने कहा, “अगर आप परिवार नियोजन या किसी अन्य टीकाकरण अभियान को देखेंगे, तो पाएंगे कि आदिवासी इलाक़ों में उनका विरोध खत्म होने में कुछ दशक लगे.”

उन्होंने कहा कि अफवाहें और गलतफहमियां तेजी से फैलती हैं और आदिवासी समुदायों में गहरी जड़ें जमा लेती हैं. उदाहरण के लिए, दक्षिणी गढ़चिरौली में आदिवासियों ने कोविड-19 वैक्सीन से फैलने वाली नपुंसकता के डर से खुराक लेने से इनकार कर दिया.

गढ़चिरौली के जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ शशिकांत शम्भरकर ने कहा, “शुरुआती महीनों में अगर हमारे स्वास्थ्य कार्यकर्ता आते थे, तो वे अपनी झोपड़ियों में छिप जाते थे और बाहर आने से मना कर देते थे.”

हिचकिचाहट के अलावा टीकाकरण अभियान शुरू होने के बाद के शुरुआती महीनों में वैक्सीन की आपूर्ति अनिश्चित थी. अभय बंग ने कहा कि शुरुआत में टीके की आपूर्ति नहीं थी इसलिए टीकाकरण के लिए अभियान को रोक दिया गया. कम टीके की उपलब्धता ने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को व्यापक रूप से जागरूकता बढ़ाने से रोक दिया.

क्योंकि रोज़ाना जिले के प्रदर्शन के आधार पर खुराक वितरित किए गए थे तो कम टीकाकरण संख्या का मतलब यह भी था कि आदिवासी जिलों में आपूर्ति और कम हो गई. शम्भरकर ने कहा, “अगर आपूर्ति सुचारू नहीं है तो हम भविष्य में टीकाकरण अभियान की योजना नहीं बना सकते हैं या गांवों में जागरूकता नहीं बढ़ा सकते हैं.”

उत्तरी महाराष्ट्र में 70 फीसदी से ज़्यादा अनुसूचित जनजाति की आबादी वाले नंदुरबार जिले में टीकाकरण कुल आबादी का 27 फीसदी 15 सितंबर तक पहली खुराक के साथ बंद हो गया था. यह 6 नवंबर तक 50 दिनों में बढ़कर 38 फीसदी हो गया. जो फिर भी राज्य की लगभग आधी आबादी का औसत 72.3 फीसदी है.

नंदुरबार जिले के पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी डॉ नितिन बोर्के ने कहा, “शुरुआत में आदिवासी लोग टीकाकरण के ख़िलाफ़ थे. हमने ग्रामीणों को यह दिखाने के लिए स्थानीय नेताओं और सरकारी कर्मचारियों का टीकाकरण शुरू किया कि टीके सुरक्षित थे. लेकिन जब लोग आगे आने लगे तो हमें आपूर्ति की समस्या का सामना करना पड़ा.”

जिला जुलाई तक एक दिन में 1,500-3,000 लोगों का टीकाकरण कर रहा था. अगस्त में आपूर्ति में सुधार हुआ और दैनिक संख्या बढ़कर 8,000 से 9,000 हो गई. पिछले एक पखवाड़े में पर्याप्त आपूर्ति के बावजूद दैनिक टीकाकरण गिरकर 5,000 से 6,000 खुराक प्रति दिन हो गया है क्योंकि जिले में कोविड-19 संक्रमण के एक्टिव मामले शून्य हैं.

राज्यवार असमानता

सभी आदिवासी-बहुल जिलों में कम टीकाकरण कवरेज नहीं है. हिमाचल प्रदेश में 95 फीसदी वयस्क आबादी को कोविड-19 वैक्सीन की पहली खुराक मिली है. किन्नौर में न सिर्फ 89 फीसदी पहली खुराक कवरेज है बल्कि इसने अपनी 71 फीसदी आबादी को दो खुराक देकर पूरी तरह से प्रतिरक्षित करने में कामयाबी हासिल की है.

सिक्किम के  उत्तरी सिक्किम जिले में 69 फीसदी पहली खुराक कवरेज है. इसके विपरीत, झारखंड (लोहरदगा, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम) और छत्तीसगढ़ (सरगुजा, बस्तर, नारायणपुर, बीजापुर) के कई जिलों में पहली खुराक कवरेज 40 फीसदी से भी कम है जैसा कि 6 नवंबर तक CoWIN डेटा दिखाता है.

जबकि मिजोरम के अधिकांश जिलों में पहली खुराक कवरेज 50 फीसदी से अधिक है. टीकाकरण अधिकारी डॉ लालजावमी ने कहा कि पहाड़ी इलाकों और बिखरी हुई आबादी ने आख़िरी मील तक पहुंचना मुश्किल बना दिया है. उन्होंने कहा, “लोग टीकाकरण केंद्रों तक नहीं जाते हैं. हमें उन तक पहुंचने के लिए यात्रा करनी होगी.”

गुजरात में आदिवासी स्वास्थ्य के लिए काम करने वाले एनजीओ सेवा के डॉ श्रेय देसाई ने कहा कि सरकार को बिना टीकाकरण वाले लोगों की सूची बनानी चाहिए और उन्हें एक-एक करके सलाह देनी चाहिए. वहीं बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रमों के लिए टीकाकरण अधिकारी माता-पिता के परामर्श के लिए घरों का दौरा करें.

उन्होंने तर्क दिया, “सरकार को होर्डिंग्स और विज्ञापनों से आगे बढ़कर आदिवासियों को टीकाकरण के लाभों के बारे में बताना होगा. स्थानीय राजनेताओं के पास इस पर और अधिक काम करने की गुंजाइश है.”

(यह लेख Scroll.in में अंग्रेज़ी में छपा था.) 

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