मीट बैन की माँग करने वाले PETA जैसे संगठन आदिवासी जीवन नहीं जानते हैं

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पिछले साल जुलाई में कोविड महामारी के बीच, पीपल फ़ॉर एनिमल्स (People for Animals) और पीपल फ़ॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ़ एनिमल्स (PETA) जैसे संगठनों ने नागलैंड सरकार पर दबाव बनाकर राज्य में कुत्ते के मीट की बिक्री, और खाने पर प्रतिबंध लगवाने में कामयाबी हासिल कर ली.

राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए इन संगठनों ने सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया.

इसका फ़ौरी नतीजा ये हुआ कि महामारी से पहले से ही परेशान उन लोगों की जीविका पर बुरा असर पड़ा जो कुत्ते का मीट बेचते थे.

हालाँकि 29 नवंबर को गोवाहाटी हाईकोर्ट की कोहिमा बेंच ने सरकार के इस फ़ैसले को स्टे कर दिया. लेकिन उसके बाद पेटा (PETA) ने उखरूल के एक नागा आदिवासी के ख़िलाफ़ एक मामला दर्ज कराया है.

इस मामले में इस नागा आदिवासी पर आरोप लगाया गया है कि उसने बंदूक़ से एक गाय को मारा. अब पेटा की नज़र में यह जानवरों पर क्रूरता का मामला बनता है.

पेटा की शिकायत पर इस नागा आदिवासी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है. इस एफ़आईआर में आईपीसी की धारा 11 (1) ए का इस्तेमाल किया गया है. इसके अलावा इस आदिवासी पर आर्म्स एक्ट की धाराएँ भी लगाई गई हैं.

जिस आदिवासी पर गाय को क्रूरता से मारने का आरोप है उसका वीडियो पहले सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्विटर के Cow Love@gauprem पर नज़र आया था.

इस वीडियो में यह दिखाने की कोशिश भी नज़र आती है कि क्रिस्मस की पूर्व संध्या पर इस आदिवासी ने गाय मारी थी. PETA की एफ़आईआर पर भी सोशल मीडिया पर काफ़ी चर्चा हुई है.

जिस तेज़ी के साथ यह एफ़आईआर दर्ज हुई और जिस तरह से इसका प्रचार हुआ, लोग इस पर हैरान थे. कुछ लोगों का कहना है कि असल में तो किसी भी जानवर को गोली से मारना कम क्रूर है, क्योंकि आमतौर पर जानवरों को तेज़ चाकुओं से या फिर किसी भारी हथियार से मारा जाता है.

मणिपुर और नागालैंड में गाय जैसे जानवरों की बलि की परंपरा पुरानी है

मणिपुर और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में जानवरों के ख़िलाफ़ क्रूरता रोकने वाले संगठन या कार्यकर्ताओं को लोग बहुत पसंद नहीं करते हैं.

क्योंकि यहाँ के इंडिजिनस समुदाय (Indigenous communities) इस तरह की बातों या काम को अपनी जीवनशैली में हस्तक्षेप के तौर पर देखते हैं.

मणिपुर की ही बात करें तो यहाँ के लगभग सभी समुदायों में खाने के लिए जानवरों का शिकार या उनको मारना इन समुदायों की जीवनशैली के लिए बेहद सामान्य है.

बल्कि यह कहना सही होगा कि उनकी जीवनशैली का एक अहम और ज़रूरी हिस्सा है.

यहाँ के मूल आदिवासी समूह अपने खाने या फिर सामुदायिक भोज के लिए जानवर मारने के लिए जाने जाते रहे हैं.

आदिवासियों की फ़ूड कल्चर में तो मांस खाना शामिल है ही उसके अलावा उनकी धार्मिक और सामाजिक आस्थाओं से भी ये जुड़ा हुआ है.

मणिपुर और आस-पास के दूसरे राज्यों में गाय के मांस खाने, बिक्री या फिर गाय काटने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. साल 1939 में महाराजा चूडाचंद सिंह ने गाय के मांस पर पाबंदी का ऐलान किया था, लेकिन इस ऐलान को कभी लागू नहीं किया गया.

1891 में ब्रिटिश सत्ता ने आख़िर मणिपुर पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया. लेकिन अंग्रेज़ों ने मणिपुर पर शासन की अलग विधि अपनाई थी.

उन्होंने यहाँ की पहाड़ियों में बसे आदिवासी गाँवों की शासन व्यवस्था और समाजिक आस्थाओं में दख़लंदाज़ी ना करने की नीति अपनाई.

नॉर्थ ईस्ट के आदिवासी समूह अभी भी कस्टमरी लॉ मानते हैं

2018 में इंडिया टुडे कॉनक्लेव में वर्तमान मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा था, “मणिपुर में बीफ़ बहुत अहम है. यहाँ के सभी क्रिश्चियन बीफ़ खाते हैं, ज़्यादातर आदिवासी समुदाय बीफ़ खाते हैं, घाटी के लोग भी बीफ़ खाते हैं.”

इसका मतलब बिलकुल साफ़ था कि मणिपुर में बीफ़ बैन संभव नहीं है और ना ही सरकार की ऐसी कोई योजना है.

मणिपुर में मणिपुर म्युनिसिपैलिटीस एक्ट, 1994 की धारा 164 में यह प्रावधान है कि बिक्री के लिए काटे जाने वाले जानवरों के लिए स्थानीय प्रशासन व्यवस्था करेगा.

इस क़ानून में यह भी कहा गया है कि जब स्थानीय प्रशासन बूचड़खाने के लिए जगह दे देगा तो उसके बाद खुले में जानवर नहीं काटे जाएँगे. लेकिन मणिपुर का यह क़ानून राज्य के पहाड़ी इलाक़ों में लागू नहीं होता है.

उखरूल ज़िला भी इस क़ानून के दायरे से बाहर है. हालाँकि मणिपुर की घाटी जहां यह क़ानून लागू होता है वहाँ भी सरकार की तरफ़ से कोई बूचड़खाना नहीं बनाया गया है. मतलब सरकार को खुले में जानवर काटे जाने में कोई आपत्ति है ही नहीं.

हाल ही में जानवरों पर क्रूरता के नाम पर जो एफ़आईआर दर्ज की गई है, वो मणिपुर (विलेज ऑथोरिटी इन हिल एरिया) एक्ट, 1956 का उल्लंघन है.

इसके अलावा मणिपुर (हिल एरिया) डिस्ट्रिक्ट काउंसिल्स एक्ट, 1971 के तहत भी यह कर्रावाई उचित नहीं है. मणिपुर के आदिवासी समुदायों में त्योहार, धार्मिक आयोजन या फिर रोज़ के खाने के लिए जानवर मारना आम बात है.

आदिवासी समुदायों के सांस्कृतिक और धार्मिक मामलों में कस्टमरी लॉ यानि परंपरागत क़ानून या नियम ही सर्वोपरी माने जाते हैं.

आदिवासी समुदायों में जिन्होंने क्रिश्चियन धर्म को अपना लिया है उन समुदायों में भी ये परंपराएँ जारी हैं. यहाँ के आदिवासी समुदाय आमतौर पर जानवरों को कुल्हाड़ी या दाव से मारते हैं.

नागा आदिवासियों की सामाजिक संस्था मोरूंग में समाज के नौजवानों को समाज के नियमों के अलावा जानवरों को कैसे मारा जाता है, यह भी सिखाया जाता है.

इसके अलावा यहाँ उन्हें जानवरों के शिकार की तरकीबें भी सिखाई जाती हैं. यहाँ तक कि मोरूंग संस्था के कमज़ोर होने के बावजूद जानवरों की बलि और शिकार का ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिए जाने का सिलसिला अभी भी चल रहा है.

आदिवासी समुदायों में समाज के कल्याण, आत्मा और परमात्मा को प्रसन्न करने, और बुरी आत्माओं से छुटकारा पाने के लिए जानवरों की बलि की प्रथा रही है. इसलिए जो जानवरों पर क्रूरता की बात कर रहे हैं उन्हें पूरे मसले को सही संदर्भ में देखना होगा. उन्हें आदिवासियों के जीवन और धार्मिक आस्थाओं को समझना होगा.

मणिपुर में सरकार ने ही बूचड़खाने नहीं बनाए हैं जो क़ानूनन उसे करना चाहिए था. इसका मतलब है सरकार खुले में जानवर काटे जाने में कोई एतराज़ नहीं करती है.

कोहिमा में मांस की दुकान

इस पृष्ठभूमि में पेटा (PETA) की तरफ़ से आदिवासी समुदाय के एक व्यक्ति पर एफ़आईआर आगे भी आदिवासियों को तंग करने और डराने के लिए इस्तेमाल हो सकता है.

पेटा जानवरों के साथ क्रूरता रोकने के नाम पर जो काम कर रहा है वो आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान के ख़िलाफ़ है. उनके हिसाब से तो आदिवासी समुदाय से होना ही एक अपराध जैसा लगने लग सकता है.

दुनिया भर में जानवरों के मांस का जो कारोबार है वो चिंता का विषय होना चाहिए. लेकिन मुनाफ़ाख़ोरी से पैदा हुई समस्या के लिए ज़बरदस्ती आदिवासियों को ज़िम्मेदार ठहराने का प्रयास किया जा रहा है.

यह बात ध्यान रखी जानी चाहिए कि क्लाइमेट चेंज और मुनाफ़ाख़ोरी की प्रवृति की वजह से जो समस्याएँ पैदा हुई हैं उसमें आदिवासी समुदाय शामिल नहीं है. इस कदम में आदिवासियों पर ज़बरदस्ती एक नई पहचान थोपने का प्रयास भी तो नज़र आता है.

मुझे लगता है कि एनिमल राइट्स के लिए काम करने वालों को आदिवासी समुदायों के बारे में तो कुछ पता ही नहीं है. जिस तरह से एनिमल राइट्स के नाम पर आदिवासी समुदायों पर एक पहचान या सामाजिक मूल्य थोपने की कोशिश की जा रही है, वह नस्लवादी रैवया है.

दरअसल, इस तरह की बात करने वाले वो लोग हैं जिन्हें लगता है कि आदिवासी समुदायों को उनकी सामाजिक व्यवस्था, सामाजिक और नैतिक मूल्यों के साथ ही जीना चाहिए.

जानवरों के ख़िलाफ़ क्रूरता रोकने का दावा करने वाले, आदिवासियों ने जानवरों और प्रकृति के साथ कैसे एक संतुलित रिश्ता क़ायम किया है इसे समझते ही नहीं हैं.

(यह लेख अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया गया है. इसके लेखक Richard Kamei हैं. उनका अंग्रेज़ी का लेख इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.)

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