शिवराज मामा, कितना हंसाओगे, जान ले लोगे

हमारे जैसे कुछ बददिमाग़ तथाकथित पत्रकार हैं जो बदलते भारत और चलते भारत को नहीं देख पा रहे हैं. हमारे जैसे पत्रकार शिवराज सिंह चौहान से पूछते हैं कि वन अधिकार क़ानून 13 साल बाद भी आपके राज्य में लागू क्यों नहीं हुआ है. क्या कारण है कि कुल 33 लाख से ज़्यादा दावों में से मात्र 2 लाख 7 हज़ार दावे ही स्वीकार हुए हैं. वैसे सरकार हमारे जैसे पत्रकारों के इलाज में निरंतर जुटी है, लेकिन हमारे जैसे पत्रकारों में कुछ की बीमारी लाइलाज हो चुकी है.

0
66

मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान को राज्य में प्यार से मामा बुलाया जाता है. भील आदिवासियों को भी प्यार से मामा ही बुलाया जाता है. यह कहानी मामा की मामा पर फ़िदा होने की है. झाबुआ एक भील बहुल इलाक़ा है. जहां से यह कहानी शुरू होती है.

पिछले सप्ताह मामा शिवराज सिंह चौहान ने झाबुआ में एक बड़े आदिवासी सम्मेलन को संबोधित किया था. यहाँ उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि गरीब ट्राइबल की जिंदगी बदलने का अभियान आज से प्रारंभ हो रहा है.

शिवराज सिंह चौहान ने सम्मेलन में एक और घोषणा करते हुए कहा कि 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर जनजातीय गौरव दिवस धूमधाम से मनाया जाएगा. उस दिन भोपाल में पूरे प्रदेश के आदिवासी भाई-बहनों का एक विशाल समागम होगा. 

इसके बाद मुख्य मंत्री ने घोषणाओं की झड़ी लगा दी. उन्होंने कहा कि आदिवासियों के घर-घर तक राशन पहुँचेगा. जिन आदिवासियों के पास मकान नहीं हैं, उन्हें मकान बना कर दिये जाएँगे. जिनके पास मकान के लिए ज़मीन नहीं है, उन्हें प्लाट दिए जाएँगे.

इस सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने एक बार घोषणाएँ करनी शुरू की तो लगता था कि मंच पर खड़े खड़े ही वो आदिवासियों की ज़िंदगी बदल देंगे. आदिवासियों की ज़िंदगी में भूख, बीमारी, कुपोषण सब कुछ ख़त्म हो जाएगा.

आदिवासी क्षेत्रों में अनुसूची 5, वन अधिकार क़ानून और पेसा आनन फ़ानन में आदिवासी संस्कृति और परंपरागत क़ानून को स्थापित कर दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि पेसा लागू होने के बाद अब आदिवासी क्षेत्रों के फ़ैसले भोपाल यानि राजधानी में नहीं बल्कि ग्राम सभाओं में किए जाएँगे. 

आदिवासी नौजवानों को ढूँढ-ढूँढ कर रोज़गार दे दिया जाएगा. झाबुआ और अलिराजपुर तक नर्मदा का पानी पहुँचा कर यहाँ की धरती और किसान की प्यास बुझा दी जाएगी. एक-एक बात ऐसी की हर बात पर निछावर हो जाने का मन करे. 

झाबुआ, खरगोन, बड़वानी भील बहुल इलाक़े हैं

शिवराज सिंह चौहान ने आदिवासियों को समझाया कि 50 साल तक राज्य में कांग्रेस का शासन रहा. यही 50 वर्ष आदिवासियों की बर्बादी की वजह बने हैं. लेकिन अब उनके राज में ना कोई भूखा सोएगा, ना कोई रोज़गार को भटकेगा, ना पलायन, ना विस्थापन कुछ नहीं. 

मंच पर बैठे नेतागण और सामने बैठी प्रजा को लग रहा था बस आज मामा उस वक़्त तक माइक से नहीं हटेंगे जब तक की उनको इत्मीनान ना हो जाए कि आदिवासी की ज़िंदगी में चार चाँद लग चुके हैं. अब जब कोई पत्रकार झाबुआ, अलिराजपुर, बड़वानी, खरगोन जाएगा तो वहाँ आदिवासी घरों पर ताले लटके नहीं मिलेंगे. 

अब कोई पत्रकार नहीं लिखेगा कि मध्य प्रदेश का आदिवासी दो जून की रोटी के लिए ना जाने कहां-कहां भटकता रहता है. ये आदिवासी अपने बच्चों को भी अपने साथ ले जाते हैं. इस वजह से उन बच्चों का स्कूल छूट जाता है.

अब कोई नहीं लिखेगा कि मध्य प्रदेश के आदिवासियों में कुपोषण है. अब कोई यह नहीं कह पाएगा कि मध्य प्रदेश में आदिवासी इलाक़ों में आदिवासी किसान को बारिश के भरोसे खेती करनी पड़ती है. 

क़रीब-क़रीब 16 साल से सत्ता में कायम शिवराज सिंह चौहान अब और इंतज़ार करने को तैयार नहीं हैं. अब उन्होंने ठान ली है कि आदिवासी आबादी को ग़रीबी, बेरोज़गारी, भीषण कुपोषण, शोषण, अत्याचार से मुक्ति दिलानी है. 

इसके बदले में आदिवासी को सिर्फ़ इतना करना है कि उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को उप चुनाव में जिताना है. आप ही बताएँ शिवराज सिंह चौहान की इन घोषणाओं पर कौन ना क़ुर्बान हो जाए. सिवाय हमारे जैसे कुछ बददिमाग़ तथाकथित पत्रकारों के जो बदलते भारत और चलते भारत को नहीं देख पा रहे हैं.

हम नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों को लेकर बैठे हैं कि मध्य प्रदेश आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में नंबर वन राज्य है. हमारे जैसे पत्रकार जो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की घोषणाओं की चीर फाड़ पर तुले हैं. 

ऐसे पत्रकार कहते हैं कि कोविड के दौरान आदिवासी ज़िलों में हज़ारों बच्चों की पढ़ाई हमेशा के लिए छूट गई. अलिराजपुर ज़िले में ही कम से कम 12000 आदिवासी बच्चे अब शायद कभी स्कूल ना लौट पाएँ. 

झाबुआ जहां से शिवराज सिंह आदिवासियों के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा रहे थे, उसके और आप-पास के 4 ज़िलों के क़रीब 40000 हज़ार बच्चों का कोविड के दौरान स्कूल छूट गया है. 

हमारे जैसे पत्रकार शिवराज सिंह चौहान पूछते हैं कि वन अधिकार क़ानून 13 साल बाद भी आपके राज्य में लागू क्यों नहीं हुआ है. क्या कारण है कि कुल 33 लाख से ज़्यादा दावों में से मात्र 2 लाख 7 हज़ार दावे ही स्वीकार हुए हैं.

वैसे सरकार हमारे जैसे पत्रकारों के इलाज में निरंतर जुटी है, लेकिन हमारे जैसे पत्रकारों में कुछ की बीमारी लाइलाज हो चुकी है. 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here