ओडिशा में तैयार हो रही है सरना आंदोलन की मज़बूत ज़मीन

स गाँव से निकलते समय मेरी समझ में एक बात आ रही थी कि सरना धर्म का मामला झारखंड तक सीमित नहीं रहेगा. ओडिशा में इस माँग को बड़ा समर्थन मिल रहा है. इस माँग के समर्थन में बड़े आंदोलन की ज़मीन तैयार हो रही है.

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27 मार्च 2021 का दिन था हम ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के एक छोटे से गाँव में थे. इस गाँव का नाम देवकुंड झामडिया है. दरअसल इस गाँव के पास ही एक पर्यटक स्थल है जिसे देवकुंड कहा जाता है.

इसलिए झामड़िया गाँव के लोग अपना गाँव का नाम बताते हुए देवकुंड का नाम भी जोड़ देते हैं. इससे बाहर से आने वाले लोगों को यहां पहुँचना आसान हो जाता है. 

देवकुंड झामडिया संताल आदिवासियों का गाँव हैं. हम यहाँ पर संताल आदिवासियों पर मैं भी भारत का एक एपिसोड शूट करने के सिलसिले में पहुँचे थे. इसके लिए हमें गाँव के अलग अलग संताल परिवारों से मिलना था.

इसके अलावा हमें गाँव और समुदाय के कुछ ज़िम्मेदार लोगों से मिलना था. संताल परिवारों के साथ कुछ समय बिता कर हम उनकी दिनचर्या समझना चाहते थे.

एक संताल घर

इसके साथ साथ समुदाय के बुजुर्गों और ज़िम्मेदार लोगों से इस समुदाय के सामाजिक, धार्मिक मसलों के साथ साथ उनके संवैधानिक और क़ानूनी अधिकारों पर बातचीत करना चाहते थे. 

हम अपने एक स्थानीय साथी के साथ झामड़िया गाँव के पलटन हेम्ब्रम के घर पर पहुँचे. यह घर बेहद ख़ूबसूरती से पेंट किया गया था.

सिर्फ़ इस गाँव में नहीं बल्कि संताल देश में जहां भी रहते हैं वहाँ घरों की दिवारों को ऐसे ही पेंट करते हैं. यहाँ मयूरभंज में आमतौर पर घर की दिवारों को लाल मिट्टी से लीपा जाता है. लेकिन नीचे काली मिट्टी से एक बॉर्डर बनाया जाता है. 

घरों के छप्पर आगे की तरफ़ इतने आगे होते हैं कि घर के बाहर बनाई गई आराम करने की जगह कवर हो सके. ख़ैर इस परिवार से मुलाक़ात में हमने उन्हें बताया कि इनके साथ हम पूरा दिन बिताना चाहते हैं.

इस बात पर मुझे लगा कि पलटन थोड़ी उलझन में पड़ गए थे. मैंने उनसे उनकी उलझन की वजह समझने के लिए पूछ ही लिया कि क्या बात है?

तब उन्होंने हमें बताया कि गाँव में एक बड़ी मीटिंग बुलाई गई है. जिसमें गाँव के सभी आदमी और औरत शामिल होंगे. उन्होंने बताया कि इस मीटिंग में सरना धर्म कोड पर बातचीत होगी.

ख़ैर हमने उन्हें आश्वस्त किया कि जितना समय उनके पास है हम उनके साथ उतने ही समय रहेंगे. इसके बाद उन्होंने कहा कि दोपहर का खाना खाने के बाद वो मीटिंग में चले जाएँगे.

मैंने उनसे पूछा कि क्या हम भी उनके साथ मीटिंग में जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि ज़रूर जा सकते हैं. लेकिन इसके लिए उन्होंने पहले मीटिंग बुलाने वालों से बातचीत कर इजाज़त लेने की बात जोड़ दी.

हमने पलटन के घर पर खाना खाया, तब तक पलटन को संदेश भी मिल चुका था कि वो हमें भी बैठक में ले जा सकते हैं. 

यह बैठक गाँव के बाहर एक आम के बाग़ में हो रही थी. बैठक में क़रीब 100 लोग मौजूद थे. इसमें महिलाओं और पुरूषों की संख्या बराबर रही होगी. जब हम पहुँचे उस समय भी लगातार लोगों को आने का सिलसिला चल रहा था. 

मीटिंग में महिलाएँ भी मौजूद थीं

हमने बैठक में पहुँच कर सभी का अभिवादन किया. लेकिन इस बैठक में ऐसा कुछ हुआ जिसकी उम्मीद मुझे नहीं थी. बैठक का संचालन कर रहे व्यक्ति ने हमें बैठक में मौजूद लोगों को अपने बारे में बताने को कहा.

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम यह भी स्पष्ट करें कि हम इस गाँव में क्या करने आए हैं. 

ख़ैर मैंने अपनी टीम के साथियों के साथ उस गाँव में मौजूद होने की वजह बताई. यह एक छोटा सा भाषण देने का मौक़ा था जो मैंने गँवाया नहीं और मैं भी भारत के नए प्लेटफ़ॉर्म के बारे में थोड़ी जानकारी दे दी.

लोगों से हमारे चैनल और वेबसाइट को फ़ॉलो करने की अपील भी कर दी.

इसके बाद हम बैठक में एक दर्शक की तरह से बैठ रहे और कार्यवाही चलती रही. इस बैठक में सरना धर्म कोड पर बातचीत हो रही थी.

लोगों को तैयार किया जा रहा था कि इस माँग को लेकर जल्दी ही दिल्ली जाने की ज़रूरत भी पड़ सकती है. 

बैठक में समुदाय के ज़िम्मेदार लोग मौजूद लोगों को सरना धर्म की माँग को बारीकी से समझा रहे थे. इसके साथ ही आदिवासी के लिए एक अलग धार्मिक पहचान के पक्ष में तर्क दिए जा रहे थे.

इस बैठक में कई ऐसे लोग मौजूद थे जो पढ़े लिखे और शायद अच्छे पदों पर नौकरी करने वाले लोग थे. उन्होंने भी लोगों को संबोधित किया.

हमने इस बैठक में मौजूद लोगों से हम से कैमरे पर बातचीत का आग्रह किया तो उन्होंने हमें रिक्वेस्ट के अंदाज़ में कहा कि मीटिंग ख़त्म होने से पहले आपसे बातचीत से लोगों का ध्यान कैमरों की तरफ़ ज़्यादा रहेगा. 

इस बैठक में सिर्फ़ सरना धर्म नहीं बल्कि फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट और पेसा क़ानून से संबंधित भी कुछ बातें हो रही थीं. संताल या संथाल आदिवासियों के इस गाँव में इस बैठक में मौजूद लोग जिस तरह से चर्चा कर रहे थे, वो निश्चित प्रभावित करने वाला था. 

इस गाँव से निकलते समय मेरी समझ में एक बात आ रही थी कि सरना धर्म का मामला झारखंड तक सीमित नहीं रहेगा. ओडिशा में इस माँग को बड़ा समर्थन मिल रहा है. इस माँग के समर्थन में बड़े आंदोलन की ज़मीन तैयार हो रही है. 

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