‘एकलव्य’ बच्चों की पढ़ाई ठप्प, PVTG को तो दाख़िला ही नहीं

इस रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि इन स्कूलों में पीवीटीजी यानि विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों के बच्चों को दाख़िला ही नहीं मिल पाता है. देश में एकलव्य स्कूलों की शुरुआत साल 1997-98 की गई थी. इन स्कूलों का उद्देश्य देश के आदिवासी इलाक़ों में नवोदय विद्यालयों की तर्ज़ पर आवासीय स्कूल बनाना था.

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आदिवासी बच्चों के लिए बनाए गए एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में कोविड के दौरान पढ़ाई पूरी तरह से ठप्प है. इन स्कूलों के 21 मार्च 2020 को बंद कर दिया गया था.

कोविड और लॉक डाउन के दौरान इस स्कूलों और हॉस्टलों को कोविड सेंटर के तौर पर इस्तेमाल किया गया. 

लेकिन इस दौरान आदिवासी बच्चों की पढ़ाई का क्या हुआ ? इसका कोई निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता है. लेकिन यह कहा जा सकता है कि कुल मिला कर इन स्कूलों के ज़्यादातर छात्रों की पढ़ाई पूरी तरह से ठप्प पड़ी है.

इस सिलसिले में संसद की स्थायी समिति (सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय) की मार्च 2021 की रिपोर्ट इस मामले पर यह जानकारी देती है.

एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय बंद पड़े हैं.

स्थायी समिति ने मंत्रालय से यह पूछा था कि लॉक डाउन के दौरान EMRS (Eklavya Model Residential School) के बच्चों की पढ़ाई के लिए सरकार ने क्या इंतज़ाम किए.

इसके जवाब में जनजातीय कार्य मंत्रालय की तरफ़ से बताया गया है कि इस संबंध में अलग अलग राज्यों को कई निर्देश और सलाह दी गई थी.

इन निर्देशों में से एक था कि राज्य सरकारें आदिवासी छात्रों के लिए यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल कर सकती है. 

इसके अलावा NCERT के ई लर्निंग प्लेटफ़ार्म इस्तेमाल करने की भी सलाह दी गई थी. लेकिन इस सिलसिले में कोई निश्चित नीति या प्रणाली तैयार की गई थी या नहीं, इसका जवाब नहीं मिलता है. 

फ़िलहाल देश में कुल 285 एकलव्य आदर्श आवासीय स्कूल चलाए जा रहे हैं. इन स्कूलों में 73391 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. 

इस रिपोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया है कि इन स्कूलों में पीवीटीजी यानि विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों के बच्चों को दाख़िला ही नहीं मिल पाता है.

इसकी वजह इस रिपोर्ट में बताई गई है. रिपोर्ट कहती है कि ये बच्चे इन स्कूलों के दाख़िले के लिए प्रतियोगी परीक्षा पास ही नहीं कर पाते हैं. 

देश में एकलव्य स्कूलों की शुरुआत साल 1997-98 की गई थी. इन स्कूलों का उद्देश्य देश के आदिवासी इलाक़ों में नवोदय विद्यालयों की तर्ज़ पर आवासीय स्कूल बनाना था.

इन स्कूलों में आदिवासी बच्चों को अच्छी शिक्षा और खेल कूद की बेहतर सुविधा देने का लक्ष्य रखा गया था.

वर्तमान सरकार ने 2022 तक देश के हर आदिवासी ब्लॉक में जहां कम से कम आधी आबादी आदिवासी है या फिर कम से कम 20 हज़ार आदिवासी उस इलाक़े में रहते हैं, वहाँ एक EMRS बनाने का लक्ष्य रखा है. 

सरकार इस लक्ष्य से काफ़ी दूर खड़ी नज़र आ रही है. फ़िलहाल देश में कुल 285 ही ऐसे स्कूल चल रहे हैं. वर्तमान सरकार का दावा है कि उसने कुल 588 स्कूलों को मंज़ूरी दे दी है.

सरकार का कहना है कि ज़्यादातर इलाक़ों में इन स्कूलों के लिए ज़रूरी ज़मीन राज्य सरकारें उपलब्ध नहीं कराती हैं. इसलिए इन स्कूलों की स्थापना में देरी हो रही है. 

इन स्कूलों की स्थापना के लिए केन्द्र सरकार 15 एकड़ ज़मीन माँगती है. इन स्कूलों के ज़रिए आदिवासी इलाक़ों में अच्छी स्कूली शिक्षा देने की एक भली नीयत थी, लेकिन अफ़सोस इस लक्ष्य को हासिल करने की जिस कदर कोशिश की ज़रूरत है, वो नहीं हो रही है. 

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