हसदेव अरण्य बचाने की उम्मीद टूटी, पेड़ों की कटाई शुरू

रामलाल करियम हसदेव बचाओ आंदोलन से जुड़े आदिवासी नेता हैं. वो कहते हैं कि सरकार का यह कदम हमें जड़ से उखाड़ देगा. यहाँ पर जंगल कटाई का काम शुरू हो चुका है. ऐसा लगता है कि अब जल्दी ही माइनिंग भी शुरू हो जाएगी. हम कई साल से यह आंदोलन चला रहे थे और कई बार सरकार से अपनी बात भी कही थी. लेकिन ऐसा लगता है कि उद्योग घरानों को खुश करने के लिए सरकार ने हमारी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया है. हम जानते हैं कि यहाँ माइनिंग से आदिवासी को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है.

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अर्थ-डे पर सरगुजा के हसदेव अरण्य के जंगलों के पेड़ों के साथ पली-बढ़ी महिलाओं व ग्रामीणों ने उन पेड़ों को अंतिम विदाई दी. इन ग्रामीणों की इन पेड़ों को बचा पाने की उम्मीद अब नहीं रही.  वहाँ मौजूद लोगों ने बताया कि पेड़ों को विदाई देते समय कई लोगों की आंखों से आंसू भी छलक पड़े. 

दरअसल, परसा-केते कोल ब्लॉक एक्सटेंशन की मंजूरी छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा दिए जाने के बाद खदान का खुलना लगभग तय है. इस इलाक़े में पेड़ों की कटाई  शुरू कर दी गई है. 

इस परसा-ईस्ट-केते-बासेन कोल ब्लॉक का विरोध ग्रामीण 2019 से कर रहे हैं. इस जंगल को बचाने के लिए हो रहे आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में शामिल आलोक शुक्ला ने MBB से बातचीत में कहा,” सरकार आदिवासियों की बात नहीं सुन रही है. सरकार पेसा और वन अधिकार क़ानून दोनों का उल्लंघन कर रही है.” 

जंगल में पूजा करते आदिवासी

उन्होंने आगे कहा, “पेड़ों की कटाई शुरू कर दी गई है. कांग्रेस सरकार आदिवासी समर्थक होने का दावा करती है, लेकिन वह तब की बात थी जब वो विपक्ष में थे.” लेकिन सत्ता में आने के बाद वो उन्हीं नीतियों पर चल रहे हैं जो बीजेपी की रमन सिंह सरकार ने बनाई थीं. 

उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार पर आरोप लगाया कि वो ग्राम सभाओं को नज़रअंदाज़ कर फ़र्ज़ी सहमति के दम पर ज़मीन का अधिग्रहण कर रहे हैं. यह काम बीजेपी सरकार में खूब हुआ था. उस समय कांग्रेस ने वादा किया था कि इस तरह के मामलों की जाँच कराई जाएगी.

हसदेव बचाने के लिए आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर

उस समय राहुल गांधी ख़ुद यह आश्वासन दे कर गए थे. लेकिन अब जब कांग्रेस सत्ता में है तो जाँच तो छोड़िए, रमन सिंह सरकार की नीतियों आक्रमक तरीक़े से लागू किया जा रहा है. यह देखा जा रहा है कि जब उद्योगपतियों की बात आती है तो बीजेपी या कांग्रेस में कोई भेद नहीं है.

बीजेपी की ही तरह से कांग्रेस की सरकार भी अड़ानी समूह के सामने नतमस्तक है. इस मामले में आदिवासियों ने हर संभव दरवाज़ा खटखटाया है, लेकिन अफ़सोस की किसी ने इस मामले में उनका साथ नहीं दिया है. अब आदिवासी धैर्य खो रहे हैं. 

2711 हेक्टेयर के इस कोल ब्लॉक एक्सटेंशन में 1898 हेक्टेयर जमीन फारेस्ट लैंड है. शेष 812 हेक्टेयर जमीन में 3 गांव के ग्रामीणों की भूमि एवं सरकारी जमीन शामिल हैं. राजस्थान के विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित परसा कोल ब्लॉक के डेवलेपमेंट एवं माइनिंग का ठेका अडानी इंटरप्राइसेस के हाथों में है. 

पहले चरण में परसा कोल ब्लाक के 1252 हेक्टेयर क्षेत्र से कोयला उत्खनन की अनुमति दी गई थी. इसमें 841 हेक्टेयर जंगल की भूमि एवं 365 हेक्टेयर भूमि कृषि ग्रामीण इलाके की तथा 45 हेक्टेयर भूमि सरकारी थी. इस ब्लॉक में निर्धारित अवधि 2027 थी, जहां 5 साल पहले 2022 में ही कोल उत्खनन कर लिया गया.

आदिवासी नेता क्या कहते हैं

रामलाल करियम हसदेव बचाओ आंदोलन से जुड़े आदिवासी नेता हैं. वो कहते हैं कि सरकार का यह कदम हमें जड़ से उखाड़ देगा. यहाँ पर जंगल कटाई का काम शुरू हो चुका है. ऐसा लगता है कि अब जल्दी ही माइनिंग भी शुरू हो जाएगी.

हम कई साल से यह आंदोलन चला रहे थे और कई बार सरकार से अपनी बात भी कही थी. लेकिन ऐसा लगता है कि उद्योग घरानों को खुश करने के लिए सरकार ने हमारी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया है. हम जानते हैं कि यहाँ माइनिंग से आदिवासी को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है. 

यह तस्वीर एक ग्रामीण ने भेजी है

वो आगे कहते हैं., “ हमारी ज़मीन जा रही है और जिस जंगल से हमारी जीविका और जीवनशैली दोनों जुड़े हैं वो बर्बाद हो रहा है.” हमने पहले भी छत्तीसगढ़ में देखा है कि जो आदिवासी विस्थापित हुए हैं वो कहां गए, कोई नहीं जानता. 

रामलाल कहते हैं कि उद्योग राजनीतिक दलों को चुनाव के लिए पैसा देता है. इसलिए पार्टियाँ उनकी ही बात सुनती हैं. हम कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लाए थे, लेकिन अगर सरकार ने हमारी नहीं सुनी तो हम उसे सत्ता से उखाड़ फेंकेंगे.  

2711 हेक्टेयर क्षेत्र में कोल उत्खनन की मंजूरी

दूसरे चरण में परसा ईस्ट-केते-बासेन कोल ब्लॉक में कुल 2711 हेक्टेयर क्षेत्र में कोल उत्खनन की मंजूरी दी गई है. इसमें 1898 हेक्टेयर भूमि वनक्षेत्र एवं 812 हेक्टेयर भूमि गैर वनक्षेत्र है. इसमें परसा, हरिहरपुर, फतेहपुर व घाटबर्रा के ग्रामीणों की कृषिभूमि, मकान एवं गांव भी उत्खनन की चपेट में आएंगे. 

यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ है. यहां के ग्रामीणों का जीवन हमेशा जंगलों से जुड़ा रहा है. महुआ, साल, बीज के साथ वनौषधि से भरपूर इस क्षेत्र में लोगों को आजीविका जंगलों से मिलती है. ग्रामीणों का जुड़ाव जंगलों से इतना ज्यादा है कि वे जंगलों को कटने देने को तैयार नहीं हैं. 

छत्तीसगढ़ सरकार ने राजस्थान में कोयले के संकट का हवाला देकर उत्खनन को मंजूरी दी तब भड़के ग्रामीणों ने अडानी कंपनी के कैंप में आगजनी भी कर दी थी.

पेड़ों की कटाई के लिए मार्किंग शुरू


परसा ईस्ट-केते-बासेन परियोजना को वर्ष 2019 में ही फारेस्ट क्लीयरेंस मिल चुका है. राज्य सरकार की हरी झंडी मिलने के बाद पेड़ों की कटाई के लिए मार्किंग शुरू कर दी गई थी. अब मौक़े पर मौजूद लोगों का कहना है कि पेड़ों की कटाई धीरे धीरे शुरू हो रही है.

बताया जा रहा है कि इस जंगल के कम से कम 2 लाख पेड़ काटे जाएँगे. 

कांग्रेसी सांसद सहित ग्रामीण विरोध में डटे


ग्राम सभा का फर्जी तरीके से प्रस्ताव पास कराने का आरोप लगा कोयला खदान का विरोध कर रहे ग्रामीण 300 किलोमीटर पैदल चलकर राज्यपाल से मिलने भी पहुंचे थे. 2 मार्च से ग्रामीण खदान के विरोध में आंदोलन भी कर रहे हैं. 

कांग्रेस सांसद ज्योत्सना चरणदास महंत ने भी खदान से जंगल की जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से इस परियोजना को निरस्त करने की मांग की है. उन्होंने आईबीएफआईबीएफआर व डब्लूआईआई की रिपोर्ट का भी हवाला दिया है. यूपीए सरकार में इस क्षेत्र को वर्ष 2010 में नो-गो एरिया घोषित किया गया है।

85% ग्रामीणों ने नहीं लिया है मुआवजा


परसा के एक्सटेंशन कोल ब्लॉक में निजी जमीनों के अधिग्रहण के लिए मुआवजा प्रकरण तैयार कर लिया गया है. लेकिन आंदोलन में शामिल नेताओं का कहना है कि इसमें सिर्फ 15 फीसदी लोगों ने ही अब तक मुआवजे की राशि ली है. 

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