IPFT को ठिकाने लगाने के बाद त्रिपुरा के आदिवासी इलाक़ों में अकेले दम लड़ेगी बीजेपी

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“IPFT हमारी सहयोगी है लेकिन उसका आचरण अपेक्षा के अनुसार नहीं रहा है. इसलिए IPFT के सभी कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल होना चाहते हैं. 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है जो संकेत देता है कि राज्य के आदिवासी इलाक़े की 20 सीटों पर बीजेपी अपने दम पर कामयाबी हासिल करेगी” MBB से बात करते हुए बीजेपी नेता सुब्रत चक्रवर्ती ने यह कहा. 

उन्होंने कहा कि राज्य की 66 विधानसभा सीटों पर अब बीजेपी अपने दम पर लड़ने और जीतने की योजना पर काम कर रही है.

त्रिपुरा में बीजेपी और IPFT (Indigenous Peoples Front of Tripura) के बीच एक ऐसा खेल चल रहा है जो हास्यस्पद भी है और अजीब भी लगता है. ये दोनों ही दल फ़िलहाल मिल कर राज्य की सरकार चला रहे हैं. लेकिन रोज़ एक दूसरे के खिलाफ़ बयानबाज़ी भी कर रहे हैं.

लेकिन इस सप्ताह के पहले ही दिन यानि सोमवार को बीजेपी ने ऐसा काम किया जिससे IPFT का वजूद ही ख़तरे में नज़र आ रहा है. इस घटना के बाद IPFT के नेता सदमे में हैं और बयानबाज़ी बिलकुल बंद हो गई है.

सोमवार को IPFT के कम से कम एक हज़ार कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हो गए. इतना ही नहीं इस मौक़े पर मौजूद बीजेपी नेताओं ने IPFT के ख़ात्मे का ऐलान भी किया. लेकिन यह अजीबोग़रीब स्थिति है कि IPFT अभी भी बीजेपी के नेतृत्व में चल रही सरकार में शामिल है.

दरअसल यह पूरी कसरत या फिर चालबाज़ी राज्य में आदिवासी वोट पाने के लिए हो रही है. पिछले चुनाव में IPFT के सहारे बीजेपी ने राज्य में सीपीआई (एम) की सरकार को उखाड़ फेंका था. इसके बाद दोनों ही पार्टियों ने मिल कर सरकार बनाई थी.

टिपरामोथा के नेता प्रद्योत किशोर देबबर्मन

बीजेपी-IPFT झगड़े की पृष्ठभूमि 

मार्च 2023 में त्रिपुरा में चुनाव हैं और राज्य की राजनीति में बिलकुल नए समीकरण बन रहे हैं.   

त्रिपुरा में पिछले साल एक नए राजनीतिक फ़्रंट टिपरा मोथा (TIPRA Motha) का गठन हुआ. इस फ़्रंट ने राज्य के आदिवासी इलाक़ों की स्वायत्त ज़िला परिषद (The Tripura Tribal Areas District Council) के चुनाव में बीजेपी और IPFT को बुरी तरह से हरा दिया था.

टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत देबबर्मन राज्य में कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं. उन्होंने कांग्रेस छोड़ने के बाद एक अलग दल बना कर त्रिपुरा के लिए अलग राज्य बनाने की माँग को पुनर्जीवित किया है. TTAADC (Tripura Tribal Areas Autonomous Council) में जीत के साथ उन्होंने त्रिपुरा की राजनीति में नए समिकरण पैदा कर दिए.

इस परिषद में कुल 30 सीट हैं जिसमें से 28 पर चुनाव होता है और दो सीट पर राज्यपाल सदस्यों को नामित करते हैं. पिछले साल हुए चुनाव में टिपरा मोथा ने अपने सहयोगी INPT के साथ मिल कर 18 सीट जीत ली थीं. 

इस चुनाव में टिपरा मोथा को 37.43 प्रतिशत वोट मिला था. जबकि बीजेपी को 18.72 प्रतिशत वोट से संतोष करना पड़ा था. उसके बाद से ही राज्य में BJP-IPFT गठबंधन में गड़बड़ की शुरूआतें हो गई थी. 

दरअसल टिपरा मोथा ने जब एक बार फिर से राज्य की राजनीति में अलग आदिवासी राज्य का मुद्दा उछाला. उसके इस मुद्दे पर आदिवासी युवाओं का उसे ज़बरदस्त समर्थन मिला. टिपरा मोथा के पीछे आदिवासी युवाओं को लामबंद होते देख IPFT नर्वस हो गई.

उसने ना सिर्फ़ अलग आदिवासी राज्य की माँग का समर्थन शुरू कर दिया बल्कि बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने IPFT के साथ धोखा किया है. 

अलग आदिवासी राज्य की माँग

IPFT का क्या कहना है

सोमवार को अपनी साथी पार्टी बीजेपी से झटका खाने के बाद IPFT में सन्नाटा है. ऐसा लगता है कि उसके नेता सदमे चले गए हैं. लेकिन शुक्रवार को IPFT नेता मेवार कुमार जमातिया ने MBB से बातचीत की है.  उन्होंने कहा, “ यह बात सही है कि हमारे कुछ कार्यकर्ताओं ने उनकी पार्टी (BJP) की सदस्यता ले ली है.”

इस मसले पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बीजेपी यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि यह कोई बहुत बड़ी घटना है. लेकिन राज्य की राजनीति में इस घटना से कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगी. बीजेपी एक धारणा बनाने की कोशिश कर रही है कि IPFT के सभी नेता और कार्यकर्ता उनकी पार्टी में शामिल होना चाहते हैं. लेकिन यह बात सही नहीं है.

वो कहते हैं, “ बीजेपी गठबंधन धर्म के विपरीत काम कर रही है. वो भूल गए हैं कि बीजेपी आज सत्ता में है तो हमारी बदौलत ही वो यहाँ तक पहुँचे हैं.” उन्होंने कहा कि बीजेपी बड़ी ग़लतफ़हमी का शिकार हो गई है. अपने अगले कदम के बारे में उन्होंने कहा कि अगले दो सप्ताह के भीतर पार्टी बीजेपी की सरकार छोड़ने और नए गठबंधन के बारे में फ़ैसला लेगी.

जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी और टिपरा मोथा में गठबंधन हो सकता है तो उनका कहना था कि तालमेल पर बातचीत की जा सकती है.

सोमवार को जब IPFT के कार्यकर्ता और नेता बीजेपी में शामिल हुए तो टिपरा मोथा के नेता प्रद्योत किशोर देबबर्मन ने IPFT से अपील की थी कि वो बीजेपी सरकार से बाहर आ जाए. साथ ही उन्होंने कहा था कि IPFT को टिपरा मोथा का साथ देना चाहिए.

टिपरा मोथा, सीपीआई (एम) और IPFT

सोमवार को जब कई आदिवासी कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर बीजेपी ने दोनों ही आदिवासी संगठनों टिपरा मोथा और IPFT को झटका दिया तो सभी चकित थे. इस मौक़े पर बीजेपी के नेताओं ने टिपरा मोथा पर आरोप लगाया कि वो पर्दे के पीछे सीपीआई (एम) के साथ हाथ मिलाए हैं.

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि लंबे समय तक सत्ता में रही सीपीआई (एम) को आदिवासी इलाक़े में असर रखने वाली टिपरा मोथा का साथ मिल जाए तो वो फिर से सत्ता में वापसी की मज़बूत दावेदार बन सकती है.

लेकिन टिपरा मोथा ने कम से कम अभी तक कोई संकेत नहीं दिये हैं जिससे यह लेग कि ऐसा कोई गठबंधन बन सकता है. हालाँकि सीपीआई (एम) के एक बड़े नेता ने MBB को बताया कि उनकी पार्टी आदिवासी नेताओं से बातचीत कर रही है. हालाँकि यह बातचीत अभी तक औपचारिक स्तर पर नहीं पहुँची है. 

अलग आदिवासी राज्य पर बीजेपी क्या कहती है

बीजेपी का कहना है कि उसके घोषणापत्र में कभी अलग राज्य का वादा नहीं था. इसके अलावा IPFT को भी कभी बीजेपी ने अलग राज्य का वादा नहीं किया था. पार्टी का कहना है कि टिपरा मोथा की यह माँग बेकार की है.

बीजेपी नेता सुब्रत चक्रवर्ती ने कहा,” अलग आदिवासी राज्य की माँग को उछाल कर टिपरा मोथा के नेता राज्य के विकास को बाधित कर रहे हैं जो बीजेपी की सरकार के नेतृत्व में हो रहा है.”

वो कहते हैं कि अलग आदिवासी राज्य की माँग व्यवहारिक नहीं है. उन्होंने कहा कि टिपरा मोथा के कार्यकर्ता और नेता भी इस बात को समझ रहे हैं. इसलिए वो इनका साथ छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं.

उन्होंने दावा किया कि अगले विधानसभा चुनाव में अलग राज्य का मुद्दा किसी को जीत नहीं दिला पाएगा. बीजेपी अपने विकास के काम के दम पर अकेले ही सरकार बनाने की सूरत में होगी.

उन्होंने दावा किया कि पार्टी इस सिलसिले में एक मज़बूत रणनीति पर काम कर रही है.

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