खोनोमा गांव: अंगामी नागाओं के निरंतर युद्ध में रहने की कहानी

खोनोमा के लोगों ने उस समय के दुनिया के सबसे ताक़तवर साम्राज्य से लोहा लिया, और उनकी ग़ुलामी कभी स्वीकार नहीं की. उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, लेकिन खोनोमा में कभी उनका सूरज नहीं उगा. यहां की ज़मीन, हवा और पानी सदा अंगामियों का ही रहा है और रहेगा. वो आज भी अंग्रेज़ अफ़सर डैमन्ट के खोनोमा आने की कहानी सुनाते हैं.

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खोनोमा के एक घर की खिड़की से झांकते अंगामी बच्चे

 

खोनोमा गांव का नया द्वार बनाया गया है. द्वार के बाहर ही गांव के उन लोगों के नाम लिखे हैं जिन्होंने इस द्वार के लिये ज़मीन दान की थी. पहली नज़र में यह एक साधारण सी बात लगती है कि जिन्होंने गांव का द्वार बनाने के लिये ज़मीन दी है उनके नाम लिखकर आभार प्रकट किया जायेया. लेकिन खोनोमा के द्वार के बाहर लगे ये शिलापट्ट नागा आदिवासी और अपनी ज़मीन को लेकर उनकी धारणा का संकेत भी देते हैं.

दरअसल नागा आदिवासियों ने अपनी ज़मीन पर कभी किसी का दख़ल मंज़ूर नहीं किया, और आज़ादी के बाद भी भारत के संविधान में यह व्यवस्था की गई कि यहां सरकार नहीं बल्कि यहां के आदिवासी अपनी ज़मीन के मालिक होंगे.

एशिया का सबसे हरित गांव का दावा करने वाले एक साईनबोर्ड को देखते हुए हम गांव की तरफ़ बढ़ चले.गांव तक जाने वाली सड़क एक दम साफ़ सुथरी है. पहाड़ की खाई की तरफ़ रेलिंग लगाई गई है और जगह-जगह कूड़ेदान बनाये गये हैं.

यह सड़क किसी भी पहाड़ी शहर के मॉल रोड़ जैसी नज़र आती है. गांव में घुसते ही बांई तरफ़ एक विशाल बैपटिस्ट चर्च है. रास्ते के कोने पर एक पत्थर गढ़ा है जिसपर शायद उन लोगों के नाम लिखे हैं जो पृथक नागा राष्ट्र की मांग के लिये भारत के सुरक्षाबलों से लड़ते हुए मारे गए.

यहां खोनोमा गांव के उन लोगों के नाम लिखे हैं जो भारतीय सुरक्षा बलों से लड़ते हुए मारे गए हैं

गांव में दाईं तरफ खंडहर हो चुका एक द्वार है…जहां से ऊपर सीढ़ियां जाती हैं. ऊपर पहाड़ी पर एक सफ़ेद पत्थर लगा है. यह पत्थर कोहिमा के पहले अंग्रेज़ कलेक्टर जीएच डैमन्ट पर नागाओं की जीत की निशानी है. यह अंग्रेज़ अफ़सर 3 अक्टूबर, 1879 को 81 सिपाही लेकर खोनोमा पर ब्रिटिश आधिपत्य जमाने के मक़सद से पहुंचा था.

लेकिन खोनोमा के अंगामी नागाओं ने उसे मार गिराया. उसके साथ आये सिपाहियों में से 36 भी मारे गये. इसके अलावा 22 नवंबर, 1879 के दिन मारे गये ब्रिटिश सेना के कुछ और अफ़सरों और सिपाहियों के पत्थर भी यहां लगाये गये हैं.

अंंग्रेज़ अफ़सर जी एच डैमन्ट के नाम का पत्थर

खोनोमा गांव पहाड़ी चोटी पर बसा है, और तीन हिस्सों में बंटा है. अंगामी आदिवासी इन तीन हिस्सों को खेल कहते हैं. तीनों खेल के नाम हैं मेहरमा, सेमोमा और थोबोमा. आजकल इन्हें एम खेल, एस खेल और टी खेल कहा जाता है.

खोनोमा गांव के जिस हिस्से में हम सबसे पहले पहुंचे वो एम खेल था. यहां गली में कुछ लोग मौजूद थे. उन्होंने हमारी तरफ़ जिन नज़रों से देखा उससे साफ़ था कि हमारा वहां स्वागत करने को कोई आतुर नहीं है. बल्कि उनकी नज़रें हमें असहज कर रही थीं.

खोनोमा के एम खेल का द्वार

हम वहां से थोड़ा आगे बढ़ गए. थोड़ी दूर चलते रहे तो कुछ लड़के नज़र आए. मैंने उन्हें बताया कि हम दिल्ली से आए हैं. इनमें से एक लड़के ने आगे बढ़कर कुछ गर्मजोशी दिखाई तो मेरा हौसला बढ़ा. मैंने इस लड़के को बताया कि मैं यहां सैलानी के तौर पर घूमने नहीं आया हूं, मैं एक पत्रकार हूं और अंगामी आदिवासियों के बारे में एक रिपोर्ट तैयार करना चाहता हूं.

मैंने उसे कहा कि क्या वो मुझे कुछ ऐसे लोगों से मिलवा सकता है जो मुझे खोनोमा गांव के बारे में, और यहां के अंगामी आदिवासियों के बारे में कुछ बता सकें. उस लड़के ने बताया कि एम खेल यानि मेहरमा खेल में एक घर में शादी है, और सभी उसमें व्यस्त हैं. लेकिन उसने कहा कि फिर भी वो कोशिश कर सकता है.

वो हमें उस घर ले जाने के लिए तैयार हो गया जहां शादी थी. जहां हम ये बातचीत कर रहे थे, वहीं से ऊपर पहाड़ी की तरफ सीढ़ियां थीं. थोड़ा ऊपर चढ़ने के बाद उसने बाईं तरफ़ के एक बड़े से घर को दिखाया और कहा कि इस घर का मालिक हमें अंगामी समाज की परंपराओं और त्यौहारों के बारे में काफ़ी कुछ बता सकता है. उसने हमें रुकने के लिए कहा और घर के अंदर चला गया. लेकिन जल्दी ही लौट आया, और बताया कि वो आदमी भी शादी वाले घर में ही गया हुआ है.

खोनोमा गांव के लोगों के साथ श्याम सुंदर

वो फिर हमारे आगे-आगे सीढ़ी चढ़ने लगा, कुछ देर बाद दाईं तरफ़ एक पक्का घर दिखा. घर काफ़ी बड़ा था और उसके सामने एक बड़ा सा बरामदा और घर के चारों तरफ़ बड़ा सा आंगन था,जो रेलिंग से घिरा हुआ था. बाईं तरफ़ से पहाड़ और नीचे बसा खोनोमा गांव का हिस्सा नज़र आता था. यहां धूप में 15-20 लोग बैठे थे. बरामदे में कई तख़्त लगे हुए थे. इन तख़्तों पर कई सूअरों का मांस रखा गया था. यहां के लोग अचानक हमें वहां देखकर हैरान ज़रूर हुए, लेकिन उनके मिलने में गर्मजोशी थी.

मैंने उन्हें बताया कि मैं दिल्ली से आया हूं, और यहां आने से पहले मोन और मोकोकचुंग में कोनियाक और आओ ट्राइब के लोगों से मिल चुका हूं. अभी मैं बातचीत की शुरुआत कर ही रहा था तभी बीच में एक आदमी हंसते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में बोला ‘मोडी कैसा है?’ इस पर मैंने कहा ठीक है, और पूछा कि क्या यहां पर भी मोदी जी पॉपुलर हैं ? उसपर वो ज़ोर से हंस दिया और बोला यहां मोडी को कोई पसंद नहीं करता है. पर सेंटर के साथ सब रहता है.

इन लोगों ने हमें कुर्सियों पर बैठने की जगह दी और चाय का इंतज़ाम किया. उसके बाद उन्होंने बताया कि घर में शादी है और अगले दिन की तैयारी हो रही है. शादी में एम खेल के सभी परिवारों को दावत दी जाएगी. उसके लिए आज ही खाना बनाने की तैयारी हो रही है.

हमने ख़ूबसूरत नज़ारों के बीच गुनगुनी धूप में चाय पी, और फिर उनसे कहा कि क्या मैं उनसे खोनोमा और अंगामी आदिवासियों के बारे में बात कर सकता हूं. उन्होंने कहा कि अगर वर्तमान के बारे में थोड़ी बहुत बात करनी है तो बेशक कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने कहा कि नीचे की तरफ़ एक घर है जहां पर बुज़ुर्ग हैं जो हमें बहुत कुछ बता सकते हैं.

ये लोग उसी बुज़ुर्ग की बात कर रहे थे जिसके घर वो लड़का गया था. फिर उस लड़के ने बताया कि वो बुज़ुर्ग घर पर नहीं है. तब इन लोगों ने कहा कि ‘वो यहीं पर है.’ फ़िलहाल वो शादी के लिए मीट काटने का काम कर रहा है. उन्होंने खड़े होकर हमें रेलिंग के पास नीचे की तरफ़ एक घर के आंगन में दिखाया, तो एक बुज़ुर्ग सुअर की आंत साफ़ कर रहे थे. उन्होंने सुअर की आंत में पानी भरा था और उसे दोनों तरफ़ से ऊपर-नीचे कर रहे थे.

पीजल हूको, अंगामी समाज और संस्कृति के जानकार हैं

उन्होंने वहीं से उन्हें आवाज़ दे कर बताया कि वो थोड़ी देर काम छोड़ दें, और हम से बात करें. लेकिन इन लोगों ने कहा कि वो ना हिन्दी बोल पाएगा और ना ही अंग्रेज़ी. लेकिन उस लड़के ने हमारी मुश्किल आसान कर दी. उसने कहा कि बुज़ुर्ग जो भी बात करेगा वो उसका अनुवाद हमें बता देगा.

हम इस बुज़ुर्ग के साथ नीचे उसके घर आ गए. इस बुज़ुर्ग ने अपना नाम पीजल हूको बताया. घर की दीवारें लकड़ी की हैं, और ऊपर छप्पर है. घर में सामने एक बड़ा सा बैठकनुमा कमरा है. इस कमरे से एक सीधा रास्ता उनकी रसोई में जाता है, जिसमें बीचोंबीच एक चूल्हा है और उसके ऊपर मांस, मसाले और धान रखने के लिये झूला बनाया गया है.रसोई में जगह-जगह गाय और सूअर का मांस लटका हुआ था.

इस घर की इस गांव में एक ख़ास पहचान है और घर के मालिक की ख़ास ज़िम्मेदारी. इस घर को खोनोमा गांव के अंगामी समुदाय की नर्सरी कहा जा सकता है जहां लड़के लड़कियों को उनके समाज की परंपराओं, त्यौहारों, गांव के प्रशासन, और इतिहास की ट्रेनिंग दी जाती है.

नागा आदिवासियों के गांव में बातचीत करने के लिये आपको दुभाषिये की ज़रूरत पड़ती है,और लगभग हर गांव में आपको अलग दुभाषिया चाहिए क्योंकि यहां पर लगभग हर गांव की भाषा, बोली या लहज़ा अलग-अलग है.यहां तक कि नागा आदिवासी भी एक दूसरे की भाषा-बोली को नहीं समझ पाते हैं.

ख़ैर, इन बुज़ुर्गवार से हमने इस लड़के की मदद से बातचीत को आगे बढ़ाया. उन्होंने अपनी बैठक में लटके टोकरियों और मछली पकड़ने के ट्रैप जैसी चीजों को दिखाया और बताया कि वो अंगामी लड़के-लड़कियों को यह सब बनाना सिखाते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अब ज़्यादातर लड़के-लड़कियां यह सब सीखने कम ही आते हैं. लेकिन हां, फिर भी कुछ लड़के-लड़कियां आते भी हैं.

वो आगे कहते हैं कि अब अंगामी त्यौहारों का रूपस्वरूप सब बदल चुका है. वैसे तो अभी भी अंगामियों के पुराने और परंपरागत त्यौहार मनाए जाते हैं, लेकिन अब सभी अंगामी इसाई बन चुके हैं. इसलिए इसाई धर्म के त्यौहार मनाते हैं.

खोनोमा का बैपटिस्ट चर्च

वो बताते हैं कि पहले फ़रवरी के महीने में अंगामी एक त्यौहार मनाते थे. इस त्यौहार पर लड़के-लड़कियां जंगल में जाते थे और तरह-तरह की चीज़ें जमा करके लाते थे. इन चीज़ों से वो टोकरी, मछली पकड़ने के ट्रैप और कुछ और चीज़े भी बनाते थे, और एक दूसरे को ग़िफ़्ट करते थे.

वो दीवारों पर लटकी उन चीज़ों को हमें दिखाते जाते हैं. पीजल कहते हैं कि अब अंगामी त्यौहार उस उत्साह से नहीं मनाए जाते. बल्कि अब एक औपचारिकता सी पूरी होती है. एक तरह से यह घर अब अंगामी गुरूकुल की बजाए एक म्यूज़ियम ज़्यादा हो गया है, और एम खेल के लोग इन बुज़ुर्ग को हमारे जैसे लोगों को अंगामी आदिवासी इतिहास की झलक देने के लिए कुछ पैसे देते हैं.

वो बताते हैं कि अंगामी आदिवासी समुदाय के गांव खेल में और खेल कुलों या कुटुम्बों में बंटे होते हैं. हर कुल या कुटुम्ब का प्रभाव अलग-अलग है. सामाजिक रिश्तों के आधार और बुनावट में कुलों की अहम भूमिका है.

इस सब बातचीत के बाद इस घर से एक बार फिर हम उसी घर पर आ गए जहां शादी की तैयारी हो रही थी. वहां एक बार फिर लोगों ने हमारे लिए चाय मंगवा दी. चाय पीते-पीते मोदी पर मज़ाक करने वाले उसी आदमी ने फिर मज़ाक करते हुए कहा कि ‘सुना है दिल्ली में आजकल गाय के मांस पर बवाल हो रहा है?’ फिर वो कहते हैं कि नागालैंड में तो बिना गाय के मांस के नहीं चल सकता.

लेकिन फिर संजीदा होते हुए कहा कि हमें गांव के एक और बुज़ुर्ग से ज़रूर मिलना चाहिए जो हमें अंगामी और नागाओं के इतिहास के बारे में बता सकते हैं. ख़ासतौर पर नागा विद्रोह के बारे में उनकी अच्छी पकड़ है. उन्होंने बताया कि वो बुज़ुर्ग एक समय में फीज़ो के साथ रह चुके हैं, जो पृथक नागा राष्ट्र की मांग करने वाले पहले नागा नेता थे.

जब हम इन बुज़ुर्ग के घर पहुंचे तो इनको हमारे आने की सूचना मिल चुकी थी. पहले उन्होंने बड़ी शान से अपने घर में रखा मिथुन का सिर दिखाया, जिसको उन्होंने पॉलिश करवा कर रखा है. इन बुज़ुर्ग का नाम शीले सखरे है और वो मेहरमा खेल से हैं. उम्र क़रीब 75 बरस. इनसे बातचीत एक बार फिर अंगामियों और खोनोमा के इतिहास की तरफ़ मुड़ गई.

वो बड़े अभिमान के साथ बताते हैं कि खोनोमा के लोगों ने उस समय के दुनिया के सबसे ताक़तवर साम्राज्य से लोहा लिया, और उनकी ग़ुलामी कभी स्वीकार नहीं की. उन्होंने कहा कि अंग्रेज़ साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था. लेकिन खोनोमा खोनोमा में कभी उनका सूरज नहीं उगा. यहां की ज़मीन, हवा और पानी सदा अंगामियों का ही रहा है और रहेगा. वो फिर से अंग्रेज़ अफ़सर डैमन्ट के खोनोमा आने की कहानी सुनाते हैं.

अंग्रेज़ों के साथ खोनोमा के अंगामियों का लंबा संघर्ष चला. इन आदिवासियों को गांव छोड़कर जंगल में भटकना पड़ा. अंग्रेज़ों की तरफ़ से कम से कम दो बार खोनोमा गांव को जला दिया गया, यहां तक कि उनके खेत भी बर्बाद कर दिये गये. लेकिन खोनोमा आदिवासियों ने हार नहीं मानी.

शीले कहते हैं कि अंग्रेज़ों से हारने के बाद भी और उनके चले जाने के बाद आज़ाद भारत में भी नागाओं के मन में स्वाधीनता की लौ कभी बुझी नहीं. वो बताते हैं कि आज़ाद भारत में नागा राष्ट्र की मांग उठाने वाले और नागा नैशनल काउंसिल का गठन करने वाले ऐज़ी फीज़ो भी अंगामी थे, और खोनोमा गांव के ही रहने वाले थे.

शीले कहते हैं कि पिछले क़रीब सौ साल में अंगामी नागा, या फिर यूं कहें कि पूरा नागा समुदाय जितना बदला है, उतना शायद ही कोई समाज बदला हो. मामला चाहे धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं का हो या फिर राजनीतिक.

हमने शीले सखरे से विदा ली और खोनोमा गांव में कुछ समय और बिताया. उनके खेतों को देखा जहां पर धान कट चुका था और अगली फ़सल के लिए खेतों को तैयार किया जा रहा था. ये खेत घाटी की समतल ज़मीन पर हैं और यहां पर स्थाई खेती होती है.

खोनोमा में अंगामी नागाओं से मिलकर इन आदिवासियों के बारे में काफ़ी कुछ समझ भी आया, पर ना जाने कितने और सवाल मन में पैदा हो गए.

कुल मिलाकर अंगामी नागा समुदाय या फिर पूरे नागा समाज को समझना काफ़ी पेचीदा काम है. यह एक ऐसा समाज है जिसमें बड़े परिवर्तन आये हैं. लेकिन यह समाज आज भी अपनी सामाजिक, प्रशासनिक और न्याय व्यवस्था को आदिवासी परंपराओं से चलाने की कोशिश कर रहा है.

यह समाज नागा राष्ट्रीयता की पहचान चाहता है लेकिन ख़ुद भाषा, कुलों और क्षेत्रों में बंटा है. जैसा हमने ऊपर ज़िक्र किया कि नागा आदिवासियों की भाषा में इतनी विविधता है कि एक गांव के लोग दूसरे गांव के लोगों की भाषा तक नहीं समझ पाते हैं.

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