द्रोपदी मूर्मु से मिले आदिवासी नेता, 4 साल से लंबित बिल की तरफ़ ध्यान खींचा

6 फ़रवरी 2019 को राज्य सभा में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बिल पेश किया था. इस बिल में फ़ाइनेंस कमीशन और संविधान की छठी अनुसूची में बदलाव प्रस्तावित हैं. संविधान की अनुसूची 6 असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के आदिवासी ज़िलों में प्रशासन से संबंधित है. संविधान में संशोधन करके छठी अनुसूची के प्रावधानों को और मज़बूत करने का प्रस्ताव है. 

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आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के नेताओं ने ने शनिवार 20 अगस्त को राष्ट्रपति द्रोपदी मूर्मु से मुलाक़ात की है. इस मुलाक़ात में मंच के नेताओं ने द्रोपदी मूर्मु को इस सर्वोच्च पद पर निर्वाचित होने की बधाई दी. इसके साथ ही कई आदिवासी मसलों को भी उनके ध्यान में लाने की कोशिश की है.

आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच का नेतृत्व सीपीआई (एम) की नेता और पूर्व राज्य सभा सांसद बृंदा करात ने किया. इस मुलाक़ात के बाद MBB से बात करते हुए बृंदा करात ने कहा कि राष्ट्रपति ने बड़े ध्यान से प्रतिनिधी मंडल की बातों को सुना.

उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति मूर्मु ने इस बातचीत में आदिवासियों के बीच शिक्षा की स्थिति पर काफ़ी बातें की. इसके अलावा प्रतिनिधी मंडल की तरफ़ से भी नए पर्यावरण नियम और दूसरे मसलों को उनके सामने उठाया.

बृंदा करात ने बताया कि राष्ट्रपति ने प्रतिनिधी मंडल को आश्वासन दिया है कि वो आदिवासियों से जुड़े सभी मसलों पर गंभीरता से विचार करेंगी.

आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक जितेन्द्र चौधरी ने MBB से बातचीत में इस बैठक में उठे मसलों के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि उन्होंने कई अहम मसलों को राष्ट्रपति के संज्ञान में लाने की कोशिश की है.

उन्होंने बताया कि 125वां संविधान संशोधन बिल पिछले 4 साल से संसद में लंबित है. राष्ट्रपति से बातचीत में यह मामला भी उठाया गया है. MBB से बातचीत में उन्होंने कहा कि उतर-पूर्व के राज्यों के लिए यह बिल बेहद महत्वपूर्ण है. 

लेकिन पिछले 4 सालों से लंबित बिल पर केन्द्र सरकार या फिर सत्ताधारी दल बीजेपी ख़ामोश है. त्रिपुरा से आए आदिवासी नेता जितेन्द्र चौधरी ने कहा कि बीजेपी ने साल 2018 में आदिवासियों से जो वादे किये थे उनमें से कोई भी वादा पूरा नहीं हुआ है. 

इस बैठक के बाद जितेन्द्र चौधरी ने भी कहा कि राष्ट्रपिता ने प्रतिनिधी मंडल की बातों को बहुत ध्यान से सुना. उन्होंने बताया कि प्रतिनिधी मंडल में शामिल ओडिशा के नेता सालो मरांडी ने आदिवासियों के घर जलाने और फसल नष्ट करने का मामला भी राष्ट्रपति मूर्मु के सामने रखा.

125वां संशोधन क़ानून के प्रस्ताव क्या हैं

6 फ़रवरी 2019 को राज्य सभा में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह बिल पेश किया था. इस बिल में फ़ाइनेंस कमीशन और संविधान की छठी अनुसूची में बदलाव प्रस्तावित हैं. 

संविधान की अनुसूची 6 असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम के आदिवासी ज़िलों में प्रशासन से संबंधित है. संविधान में संशोधन करके छठी अनुसूची के प्रावधानों को और मज़बूत करने का प्रस्ताव है. 

संविधान की अनुसूची 6 के प्रावधानों के अनुसार इन चार राज्यों (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम ) में एक ज़िला परिषद के साथ स्वायत्त ज़िलों की व्यवस्था दी गई है. इसके अलावा राज्य के राज्यपाल ज़िलों को बाँट कर क्षेत्रिय स्वायत्त परिषद का गठन कर सकते हैं. 

इन स्वायत्त ज़िलों का प्रशासन चलाने की ज़िम्मेदारी ज़िला या फिर क्षेत्रिय परिषदों की होगी. यह बिल इस व्यवस्था में विलेज और म्युनिसिपल काउंसिल जोड़ने का प्रस्ताव रखता है. 

इस बिल के प्रस्ताव के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव या गाँवों के समूह में विलेज काउंसिल का गठन किया जाएगा. इस तरह से हर ज़िले में म्युनिसिपल काउंसिल स्थापित की जाएँगी. इस बिल में यह प्रस्ताव किया गया है कि विलेज काउंसिल और म्युनिसिपल काउंसिल की कम्पोजिशन और संख्या, परिसीमन के साथ साथ उनके अधिकार और सीमाओं के बारे में जिला स्वायत्त परिषद नियम बना सकती है. 

इस मामले में गवर्नर विलेज काउंसिल या म्युनिसिपल काउंसिल के अधिकारों और ज़िम्मेदारियों के बारे में नियम बना सकते हैं. ये अधिकार और ज़िम्मेदारी आर्थिक विकास की योजना, ज़मीन सुधार और शहरी नियोजन जैसे मामलों से जुड़ी होंगी.

इसके अलावा इस बिल में ऐसे राज्यों में स्टेट फ़ाइनेंस कमीशन की स्थापना का भी प्रस्ताव है. इस कमीशन का काम स्वायत्त ज़िलों, विलेज और म्युनिसिपल काउंसिल की वित्तीय स्थिति की निगरानी और समीक्षा करना होगा. 

इस बिल में उतर पूर्व के चार राज्यों के आदिवासी इलाक़ों के लिए कुछ और भी प्रावधान करता है. ये प्रावधान काउंसिल के इलेक्शन, किसी सदस्य को अयोग्य करार देने के नियम आदि से जुड़े हैं. 

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