आदिवासियों के साहस और जीत की कहानी, कैसे अपने हक़ हासिल किये

वो जंगल में बिखरे कुछ पंखों के फ़ोटो खींच कर ले गए. इन पंखों के आधार पर उन्होंने यहाँ के दुर्लभ पक्षियों के लिए ख़तरे की रिपोर्ट तैयार की. इस रिपोर्ट में आदिवासियों को इस ख़तरे के लिए ज़िम्मेदार करार दिया गया.

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हम लोग महाराष्ट्र के पालघर ज़िले से ठाणे की वाडा तहसील होते हुए शाहपुर पहुँचे. यहाँ के एक छोटे से गाँव में हमने रात बिताई और सुबह सुबह हम तानसा नेशनल पार्क में बसे आदिवासी गाँवों की तरफ़ निकल गए. हमारे साथ गाड़ी में भास्कर नाम का एक लड़का था.

भास्कर एक राजनीतिक तौर पर जागरूक नौजवान है. रास्ते में उनसे बातें हो रही थी तो उन्होंने हमें एक क़िस्सा बताया. दरअसल वो हमें समझाने की कोशिश कर रहे थे कि तानसा नेशनल पार्क में बसे आदिवासियों को किस नज़रिए से देखा जाता है.

पर्यावरण और जंगली जीव जंतुओं की चिन्ता करने वाले लोग कई बार आदिवासियों को जंगल और यहाँ की जीव विविधता को नष्ट करने वाले समुदायों के तौर पर पेश करते रहे हैं. वो एक ऐसी ही किसी स्टडी का ज़िक्र कर रहे थे.

इस स्टडी के आधार पर जनहित याचिका दर्ज हुई कि तानसा नेशनल पार्क में रह रहे आदिवासियों से जंगल और जीव जंतुओं को ख़तरा पैदा हो रहा है. उन्होंने जो बताया वो मज़ेदार कहानी भी थी और अफ़सोसनाक घटना भी थी.

उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले कुछ लोग जंगल में आए. उन्होंने बताया कि वो पशुमित्र नाम के संगठन से हैं. वो यहाँ के जानवरों और पशु पक्षियों के बारे में जानना चाहते हैं. आदिवासियों ने उनकी खूब आवभगत की.

लेकिन बाद में पता चला कि वो जंगल में बिखरे कुछ पंखों के फ़ोटो खींच कर ले गए. इन पंखों के आधार पर उन्होंने यहाँ के दुर्लभ पक्षियों के लिए ख़तरे की रिपोर्ट तैयार की. इस रिपोर्ट में आदिवासियों को इस ख़तरे के लिए ज़िम्मेदार करार दिया गया.

हमारे लिए भी यह कोई नई जानकारी नहीं थी. क्योंकि देश के कई बड़े जंगलों में जंगल और जैव विविधता को बचाने के लिए आदिवासियों को विस्थापित किया गया है या फिर उन पर लगातार विस्थापन का दबाव बनाया गया है.

तानसा नेशनल पार्क से यह जो सड़क है वो एक पाइप लाइन के साथ साथ चलती है और अंततः हाइवे से जुड़ जाती है. फिर सड़क और पाइप लाइन दोनों ही मुंबई पहुँच जाती हैं. इस पाइपलाइन से मुंबई महानगर और उसके उपनगरों में पीने के पानी के साथ साथ इंडस्ट्री के लिए ज़रूरी पानी पहुँचता है.

अभी नदी जोड़ने और बांध बनाने के कई प्रस्ताव हैं, क्योंकि महानगरों की प्यास और ज़रूरत अंतहीन है. ज़ाहिर है महानगरों की प्यास बुझाने और इंडस्ट्री की ज़रूरत को पूरा करने के लिए भी जंगल और जीव-जंतु कुछ क़ीमत तो चुकाते ही होंगे.

लेकिन इस जंगल में बसे आदिवासियों के गाँवों तक जाने के लिए आपको यह सड़क छोड़नी पड़ती है. क्योंकि सभी गाड़ियाँ जंगल के रास्तों के झटके नहीं झेल सकती हैं इसलिए हमें गाड़ी भी बदलनी पड़ी. महाराष्ट्र के ठाणे, पालघर और नासिक के क़रीब 320 वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल को तानसा नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है.

इस जंगल में कम से कम 92 तरह के पेड़ पौधे और वनस्पति मिलती है. इनमें से कई औषधीय गुण की वनस्पति भी है. यहाँ पर क़रीब 15 तरह के वन उत्पाद यानि फल-फूल भी मिलते हैं.

वैतरणा, तानसा और गारगाई नदियाँ इस इलाक़े में बहती हैं. इस जंगल में आने से पहले हमने इसके बारे में इसकी ख़ूबसूरती और विविधता की कई कहानियाँ पढ़ीं. ये कहानियाँ यहाँ के प्राकृतिक नज़ारों की रूमानियत से लबालब थीं.

लेकिन हम जिस मौसम में यहाँ पहुँचे उसे सबसे हार्श वैदर यानि कठोर और गर्म मौसम कहा जाता है. इस वक़्त पूरा जंगल सूख कर कंकाल हो जाता है. ना कोई पक्षी मिलता है और ना ही जीव जंतु ही दिखाई देता है.

अगर कोई मिलता है तो आदिवासी. बल्कि इस मौसम में यहाँ आने से आदिवासी की ज़िंदगी को और क़रीब से देखा जा सकता है. इस जंगल में जो आदिवासी रहते हैं उसमें वारली समुदायों के लोग सबसे अधिक हैं.

1987 से 1992 के बीच यहाँ आठ गाँव और बसे थे. इन गाँवों को उन आदिवासियों ने बसाया जो किसी ना किसी विकास परियोजना के तहत विस्थापित हुए थे. इन गाँवों के आदिवासियों के संघर्ष से उन्हें कुछ अधिकार और सुविधाएँ ज़रूर मिली हैं.

लेकिन अभी भी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी मूलभूत सुविधाएँ यहाँ नहीं पहुँची हैं. मसलन 20 किलोमीटर के दायरे में कोई छोटा-बड़ा अस्पताल नहीं है. इन में से एक गाँव के लोगों ने हमें बताया कि गर्मी के मौसम में तो फिर भी बीमारों को अस्पताल तक पहुँचाया जा सकता है.

लेकिन बरसात के समय में यह काम लगभग असंभव हो जाता है. उस समय बीमार को ले जाने के लिए डोली का ही सहारा होता है. मरीज़ को डोली में लिटा कर उसे 20 किलोमीटर ढोना होता है.

इस गाँव के लोगों से और भी की मसलों पर बातचीत हुई. आप यह बातचीत उपर वीडियो पर क्लिक करके देख सकते हैं.

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