खुमली: हिमाचल प्रदेश में हाटी समुदाय की क़बीलाई न्याय व्यवस्था

गिरीपार के क्षेत्र में हाटी समुदाय की सामाजिक न्याय व्यवस्था कुछ मामूली बदलाव और अपवाद के साथ ज़िंदा है. बल्कि जनजाति का दर्जा देने की माँग से जुड़े आंदोलन ने इस संस्था को और मज़बूत बना दिया है. इस संस्था का गठन, मामलों की सुनवाई और फ़ैसलों पर पहुँचने की प्रक्रिया की तुलना देश के अलग अलग आदिवासी सामाजिक न्याय व्यवस्था की संस्थाओं से मेल खाती है.

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हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में सिरमौर के गिरीपार के इलाक़े में 154 पंचायतें हैं. गिरी नदी इस इलाक़े को राज्य के बाक़ी इलाक़ों से अलग करती है . इस नदी के नाम से जोड़ कर ही इस इलाक़े को trans giri या फिर गिरीपार का इलाक़ा कहा जाता है.

गिरी नदी इस जिले की सबसे बड़ी नदी है जो शिमला जिले के कोटखाई- जुब्बल की कुप्पड पहाडियो से निकलती है और दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती है. यह नदी पॉँवटा साहिब (Ponta Sahib) के पास यमुना नदी में मिलती है.

इसके पूर्व में टोंस नदी है जो सिरमौर और उतराखंड को अलग करती है. गिरीपार और टोंस पार की संस्कृति, जीवनशैली और धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था में कोई फ़र्क़ करना मुश्किल है. लेकिन गिरीपार और टोंस पार यानि उतराखंड के जौनसार बावर के इलाक़ों में रहने वाले समुदायों के संवैधानिक अधिकारों और सुरक्षा में ज़मीन आसमान का अंतर है.

उतराखंड के जौनसार बावर के समुदायों को 1967 में जनजाति का दर्जा मिल चुका है. गिरीपार के लोग जिन्हें हाटी कहा जाता है, अभी तक जनजाति का दर्जा पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हाटी लोगों का दावा है कि उनका समुदाय उन सभी मापदंडों को पूरा करता है जो किसी समुदाय को जनजाति की सूचि में शामिल करने के लिए ज़रूरी बताए गए हैं.

इन दावों में से एक उनकी सामाजिक न्याय व्यवस्था यानि उनके Customary Law court को समझने के लिए हम एक गांव पहुंचे. यह गांव सिरमौर ज़िले की नौहराधार तहसील की घाटी में बसा है.

दरअसल इसी गांव के नाम पर ही तहसील का नाम है. हमें बताया गया था कि इस गांव में खुमली की एक बैठक है जिसकी कार्रावाई को हम भी देख सकते हैं. खुमली यहां की सामाजिक न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च संस्था है. 

आज की खुमली में कोई व्यक्तिगत या गांवों का विवाद नहीं था बल्कि समुदाय को जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए चल रहे संघर्ष पर ही चर्चा हो रही है.  खुमली में चल रही बातचीत स्थानीय बोली में हो रही है. बातचीत शायद कुछ इस तरह की चल रही है कि बेशक हाटी समुदाय को जनजाति का दर्जा मिलने की पूरी उम्मीद है.

लेकिन फिर भी आंदोलन को ज़िंदा रखना है. जब तक कि समुदाय को जनजाति की सूचि में शामिल नहीं कर लिया जाता है. दरअसल इस आंदोलन के दौरान आयोजित जनसभाओं को ग़ैर राजनीतिक रखने के लिए उन्हें महाखुमली का नाम ही दिया जाता रहा है. क्योंकि खुमली इस समाज की न्याय व्यवस्था भी है और नियम भी तय करती है. 

खुमली के मुख्य पंचों को ठगड़े कहा जाता है. यानि कि ये वो लोग होते हैं जो अपने कुटुम्ब या कुल में सम्मानित व्यक्ति होते हैं. गाँव के कुटुम्बों को समान प्रतिनिधित्व दे कर खुमली का गठन होता है. खुमली में जब कोई अपनी फ़रियाद ले कर आता है तो ठगड़े मामले की सुनवाई करते हैं.

इस दौरान गाँव के लोग भी खुमली में मौजूद रहते हैं. यहाँ पर फरियादी अपनी तरफ़ से सबूत और गवाह पेश करता है. उसके बाद ठगड़े मामले की छानबीन के लिए चर्चा करते हैं. इस काम में गाँव के बुजुर्गों के अनुभव का इस्तेमाल भी किया जाता है. 

हमने पाया कि हाटी समुदाय की यह सामाजिक न्याय व्यवस्था नागालैंड के ट्राइबल समुदायों के कस्टमरी लॉ कोर्ट से काफ़ी मिलती जुलती है. नागालैंड में भी लगभग इसी आधार पर विलेज काउंसिल का गठन होता है. वहाँ पर गाँव कुलों या कुटुम्बों के हिसाब से अलग अलग खेल में बंटे होते हैं.

विलेज काउंसिल में हर कुटुंब से प्रतिनिधि को लिया जाता है. नागा सामाजिक न्याय व्यवस्था में पारिवारिक विवादों से ले कर गाँवों की सीमाओं तक के विवाद आते हैं.इन विवादों के निपटारे की जो व्यवस्था हमने वहाँ  देखी थी लगभग वैसी ही यहाँ खुमली के बारे में सुन रहे थे.

इस व्यवस्था को झारखंड की माँझी हड़ाम या फिर मानकी मुंडा व्यवस्था से भी मिला कर देखा जा सकता है. इसी तरह की व्यवस्था मध्य प्रदेश के भील जनजाति समाज में भी नज़र आती है. जहां पटेल सामाजिक पंचायत का मुखिया माना जाता है.

दरअसल भारत के लगभग हर जनजाति समुदाय में सामाजिक न्याय व्यवस्था की जो परंपरागत संस्थाएँ मिलती हैं, खुमली भी उसी तरह की एक संस्था है. लेकिन खुमली के गठन का प्रोसेस और नियम नागालैंड के ट्राइबल समाज के ज़्यादा क़रीब मिलते हैं. 

नागालैंड की विलेज काउंसिल और खुमली में बस एक फ़र्क़ नज़र आता है वह है औरतों की भागीदारी या उपस्थिति. खुमली में बड़ी तादाद में औरतें मौजूद हैं. यह कहना तो मुश्किल है कि यहाँ मौजूद औरतें फ़ैसले या उसकी प्रक्रिया को कितना प्रभावित करती हैं.

लेकिन कम से कम यहाँ औरतों की उपस्थिति है और उन्हें अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है. वैसे यह एक ताज़ा बदलाव है, जो शायद हाटी समुदाय के लिए जनजाति का दर्जा माँगने के आंदोलन को मज़बूत बनाने के लिए लाया गया है.

वजह जो भी हो एक परंपरागत न्याय व्यवस्था में औरतों की भागीदारी एक ज़रूरी बदलाव है. वैसे भी खुमली जैसी संस्थाओं में औरतों से जुड़े विवाद ज़्यादा आते हैं. यह भी महसूस किया गया है कि ऐसी न्याय व्यवस्था जो पूरी तरह से पुरूषों के हाथ में हैं वहाँ औरतों को न्याय की उम्मीद कम ही रहती है. 

खुमली में औरतों की उपस्थिति के साथ साथ धीरे धीरे ही सही उन्हें अपनी बात को रखने का अवसर मिल रहा है. वैसे फ़िलहाल औरतें खुमली में अपनी भूमिका उन्हीं मामलों तक सीमित देखती हैं जहां मसला महिला से जुड़ा होता है. गाँव में किसी और विवाद के निपटारे में उनकी भूमिका अभी भी नज़र नहीं आती है.

खुमली में पारिवारिक विवादों से ले कर गाँवों के बीच के विवाद निपटाए जाते हैं. आमतौर पर खुमली का फ़ैसला माने जाने की उम्मीद की जाती है. लेकिन अगर कोई फ़रियादी या फिर अभियुक्त खुमली की राय से इत्तेफ़ाक नहीं रखता है तो समाज उसे मजबूर करता है कि वो इस संस्था के फ़ैसले को मान ले.

इसके लिए सामाजिक बहिष्कार का रास्ता भी लिया जाता है. आधुनिक न्याय मूल्यों के आधार पर इस तरह के दबाव को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है. लेकिन आदिवासी न्याय व्यवस्था में इस कदम को सबसे कारगर उपाय के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. 

जनजाति का दर्जा माँग रहे हाटी समुदाय ने खुमली के ज़रिए अपने आंदोलन को भी मज़बूत किया है. लेकिन यहाँ के लोग मानते हैं कि यह राजनीतिक नहीं बल्कि एक सामाजिक मामला है. क्योंकि जनजाति का दर्जा सिर्फ़ क्षेत्र के विकास से जुड़ा मसला नहीं है. बल्कि यह समुदाय की संस्कृति और जीवनशैली को बचाने की चुनौती है. इसलिए खुमली में हाटी समुदाय को जनजाति का दर्जा देने की माँग पर विचार पूरी तरह से जायज़ माना जा रहा है. 

गिरीपार के क्षेत्र में हाटी समुदाय की सामाजिक न्याय व्यवस्था कुछ मामूली बदलाव और अपवाद के साथ ज़िंदा है. बल्कि जनजाति का दर्जा देने की माँग से जुड़े आंदोलन ने इस संस्था को और मज़बूत बना दिया है. इस संस्था का गठन, मामलों की सुनवाई और फ़ैसलों पर पहुँचने की प्रक्रिया की तुलना देश के अलग अलग आदिवासी सामाजिक न्याय व्यवस्था की संस्थाओं से मेल खाती है.

जैसा हमने पहले भी कहा कि नागालैंड के ट्राइबल समाज की न्याय व्यवस्था और खुमली में नाम को छोड़ दें तो कोई भेद नहीं किया जा सकता है. आधुनिक समय में खुमली  पर सवाल उठाया जा सकता है. लेकिन सवालों से परे तो आधुनिक न्याय व्यवस्था भी नहीं है.

अदालतों में न्याय इतना महँगा है कि आम आदमी के लिए इंसाफ़ पाना नामुमकिन नज़र आता है. फिर भी इस मसले पर बहस हो सकती है. लेकिन हम समझना चाहते थे कि क्या हाटी समुदाय की सामाजिक न्याय व्यवस्था जनजातियों की व्यवस्था से मेल खाती है. आदिवासी भारत के अनुभवों के आधार पर हम कह सकते हैं कि खुमली इस मापदंड पर खरी उतरती है

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