बेटा जंगल नहीं जाएँगे तो खाएँगे क्या ? – आदिवासी माँ

लेकिन जैसा कहा जाता है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता है और बदलाव तो अवश्यंभावी है. बदलाव इन आदिवासी समुदायों की ज़िंदगी में हो रहा है, अफ़सोस कि यह बदलाव जिस गति से और जिस दिशा में होना चाहिए, वैसा नहीं है.

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निर्भय किरसानी से मैंने बातों बात कहा, “आप जंगल को जितना अच्छे से समझते हैं, किसी और के लिए संभव नहीं है.” मेरी इस बात पर वो मुस्करा दिया था. वो कहते हैं कि जो जंगल में ही पैदा हुआ है वह जंगल को ना समझे तो फिर कौन समझेगा. उन्होंने कहा, ” हमारी माँ हमें बचपन में ही समझा देती है कि बेटा जंगल नहीं जाएँगे तो खाएँगे क्या?”

वो इस बात और आगे बढ़ाते हैं और बताते हैं कि हमारे गाँव में धान और मूँगफली की फ़सल होती है. लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरत और खाने के लिए हम लोग जंगल के ही सहारे हैं. जंगल से लकड़ी, फल और कई तरह का साग मिल जाता है. इसके अलावा कई तरह के कांदे भी जंगल में मिलते हैं.

निर्भय किरसानी क़रीब 20 साल के हैं. वो डिडायी आदिवासी समुदाय से हैं. यह समुदाय ओडिशा की विशेष रूप से पिछड़ी 13 जनजातियों में से एक है. डिडायी और पहाड़ी बोंडा आदिवासी समुदाय के बारे में कहा जाता है कि क़रीब 60 हज़ार साल पहले से इन इलाक़ों में इनके वजूद के प्रमाण मिलते हैं.

निर्भय किरसानी के गाँव का नाम ओरंगी है और ज़िला है मलकानगिरी. निर्भय और उनके गाँव के दो बुजुर्गों के साथ हम जंगल से लाल चींटी जमा करके लाए. निर्भय की माँ ने इन चींटियों से एक बहुत ही स्वादिष्ट झोल तैयार किया. आप उपर के वीडियो में इस झोल को बनाने की ख़ास विधि देख सकते हैं.

मलकानगिरी ज़िले में डिडायी आदिवासियों के कुल 38 गाँव हैं. इस समुदाय की अपनी भाषा है. लेकिन अब ये आदिवासी ओडिया और कुछ कुछ हिंदी भी बोलते हैं. एक वक़्त में झूम खेती करने वाला यह समुदाय अब धीरे धीरे स्थाई खेती की तरफ़ बढ़ रहा है.

धान के अलावा मूँगफली जैसी कैश क्रॉप भी अब यहाँ के आदिवासी समुदाय लगा रहे हैं. लेकिन उसके बावजूद उनकी आर्थिक हालत काफ़ी ख़स्ता है. इसकी वजह छोटे खेत और तकनीक और जानकारी के अभाव में सीमित उत्पादन है.

डिडायी आदिवासी समुदाय परंपरागत रूप से पहाड़ों के जंगल में रहने वाला समुदाय रहा है. आज भी इस समुदाय के लोग खेती के अलावा जंगल से कुछ उत्पाद जमा करते हैं. इसमें जलाने के लिए लकड़ी और कई तरह के कंद और फल शामिल हैं.

लेकिन यह सब कुछ मिला जुलाकर इन आदिवासियों को अपना पेट भरने लायक़ ही संसाधन उपलब्ध हैं. ओडिशा का मलकानगिरी ज़िला देश के 100 अति पिछड़े ज़िलों में शामिल है. यह एक आदिवासी बहुल ज़िला है और आदिवासी समुदायों में भी डिडायी, कोया और बोंडा जैसे समुदाय की हालत और भी ख़राब है.

इन आदिवासी समुदायों में साक्षरता दर बेहद नीचे है और बाल मृत्यु दर और कुपोषण की दर काफ़ी ऊँची है. ओडिशा सरकार की तरफ़ से 12 ज़िलों के 20 ब्लॉक में क़रीब 17 माइक्रो प्रोजेक्ट चलाए जाते हैं. पीवीटीजी यानि विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों या जिन्हें आदिम जनजाति कहा जाता है उनकी तरक़्क़ी के लिए ये प्रोजेक्ट चलाए जाते हैं.

लेकिन इनमें से कई माइक्रो प्रोजेक्ट तो 1976-77 में शुरू हुए हैं. लेकिन इन सभी कोशिशों के बावजूद ओडिशा की आदिम जनजातियों के हालात नहीं बदले हैं. बल्कि कई मायनों में तो हालात ख़राब होते गए हैं.

यह बात सही है कि आदिम जनजातियों को मुख्यधारा में शामिल करने का काम आसान नहीं था. इसमें भाषा और भौगोलिक कई तरह की विकट चुनौतियाँ थी. लेकिन मेरा जो सीमित अनुभव है उसके आधार पर मुझे लगता है कि इन प्रोजेक्ट्स को लागू करते हुए नज़रिया संरक्षणवादी ज़्यादा था.

इस बात पर ज़ोर दिया गया कि इन आदिवासियों की पहचान से छेड़छाड़ ना की जाए. लेकिन इस पूरे क्रम में ना तो इन आदिवासियों की पहचान ही बची और ना ही उन्हें मुख्यधारा में शामिल हो सके.

इन आदिवासियों के लिए बने माइक्रो प्रोजेक्ट चलाने वालों के रवैये में लापरवाही और आधी अधूरी कोशिश नज़र आती है. मसलन इन समूहों की आबादी में आ रही कमी या ठहराव की वजहों को समझने और सुलझाने की कोशिशों में कोई गंभीरता नहीं मिलती है.

लेकिन जैसा कहा जाता है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता है और बदलाव तो अवश्यंभावी है. बदलाव इन आदिवासी समुदायों की ज़िंदगी में हो रहा है, अफ़सोस कि यह बदलाव जिस गति से और जिस दिशा में होना चाहिए, वैसा नहीं है.

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