जंगल के 8 गाँव की सरपंच जितना अच्छा मुर्ग़ा पकाती हैं उतना ही अच्छा पंचायत चलाती हैं

खाना खाने के बाद जब हम कुछ लोगों से मिल रहे थे तो मैंने देखा कि उन लोगों में वो आदमी भी शामिल है जो हमें नाम से नदी पार करा कर लाया था. मैंने उनसे पूछा कि वो इसी गाँव यानि कंदाड़ी के रहने वाले हैं? उन्होंने कहा, "हाँ और जिन्होंने आपके लिए मुर्ग़ा बनाया है वो मेरी पत्नी है". मेरे मुँह से निकला था, "मतलब तुम सरपंच के पति हो?" वो हंसता हुआ कहता है पूछ लो सरपंच से.

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जब मैंने उनसे नाम पूछा तो उन्होंने कहा, “श्री मति मेनी कचलामी”. कंदाड़ी ग्राम पंचायत में कुल 8 गाँव शामिल हैं और मेनी कचलामी इस ग्राम पंचायत की सरपंच हैं. जब हम इस गाँव में पहुँचे तो अंधेरा हो चुका था. मुझे उम्मीद नहीं थी कि अब ज़्यादा लोगों से मुलाक़ात या बातचीत हो पाएगी. 

गाँव में सन्नाटा पसरा था जैसा शाम होने के बाद अक्सर हो जाता है. एक दो घरों के आँगन में आग जला कर कुछ लोग बैठे आपस में बातचीत करते हुए ज़रूर नज़र आए थे. लेकिन यह साफ़ था कि इस आदिवासी गाँव में दिन समाप्त हो चुका है और लोग सोने की तैयारी कर रहे हैं.

हमें इस गाँव तक लाने वाले 3-4 लड़के हमारे साथ ज़रूर थे. थोड़ी देर बाद सरपंच साहिबा हमसे मिलने पहुँची. हमें यहाँ ले कर पहुँचे लोगों से उन्होंने गोंडी भाषा में कुछ बातचीत की और फिर अपने घर की तरफ़ चली गईं. 

हमारे साथ मौजूद लड़कों ने बताया कि हमारे पहुँचने की ख़बर गाँव के लोगों को है. फ़िलहाल हमारे खाने का इंतज़ाम हो रहा है. इसके साथ ही हमें यह भी बताया गया कि आज रात इसी गाँव में हमारे ठहरने का इंतज़ाम भी किया गया है.

हम रायपुर से काफ़ी सुबह ही निकल पड़े थे और काफ़ी थक चुके थे. लेकिन इसके बावजूद मुझे और मेरे साथियों को मलाल था कि क्या आज का पूरा दिन सिर्फ़ सफ़र के ही नाम हो जाएगा.

मैंने अपने साथ मौजूद लड़कों से पूछा कि हमारे खाने का क्या इंतज़ाम हो रहा है? उन्हें लगा कि शायद हमें बहुत तेज़ भूख लगी है और खाने में क्या है हमें इसकी भी चिंता है? उन्होंने हमें समझाने के अंदाज़ में कहा कि खाना जल्दी ही मिलेगा और अच्छा खाना होगा.

तब मैंने उन्हें बताया कि दरअसल मैं और मेरी टीम इस बात से चिंतित नहीं है कि हमें खाने में क्या दिया जाएगा. हम चाहते हैं कि जो भी खाना हमारे लिए बन रहा है उसको अगर हम देख सकें और हो सके तो रिकॉर्ड भी कर सकें. 

हमारी यह बात सरपंच श्री मति मेनी कचलामी यानि सरपंच साहिबा तक पहुँचा दी गई. वो तुरंत हमारे पास आईं और उन्होंने कहा कि ऐसी बात है तो आज आपको एक बेहद ख़ास क़िस्म का मुर्ग़ा बना कर खिलाते हैं. 

इस मुर्ग़े की ख़ासियत ये होगी कि इसे जीरा गुंडा से बनाया जाएगा. मेरी टीम के चेहरों पर चमक थी. पहली कि देसी मुर्ग़ा खाने को मिलेगा और दूसरी कि हम ट्राइबल किचन का एक एपिसोड भी शूट कर पाएँगे तो दिन बर्बाद होने का अफ़सोस नहीं रहेगा. 

आनन-फ़ानन में हमने लाइट्स लगाईं और मेरे साथियों ने फ़टाफट फ्रेम्स फ़ाइनल कर लिए. उसके बाद देसी मुर्ग़ा लाया गया और उसको पहले आग पर सेंका गया.

सरपंच साहिबा ने ख़ुद मुर्ग़ा पकाने का फ़ैसला किया था. उन्होंने जो मुर्ग़ा कैसे पकाया यह तो आप वीडियो में देख सकते हैं. लेकिन यहाँ मैं इस महिला सरपंच के बारे में एक दो बातें आपको बताना चाहता हूँ.

मैंने उनसे उनके गाँवों और वहाँ के हालातों पर कई सवाल उनसे पूछे. उनके पास हर सवाल का जवाब मौजूद था. वो कैमरे पर बात करते हुए बिलकुल भी झिझक नहीं रहीं थीं. उन्हें अपने गाँवों के मसले पता थे और उन मसलों पर वो काफ़ी संजीदा थीं.

मसलन उन्होंने बताया कि लॉकडाउन की वजह से आदिवासी लड़के लड़कियों की पढ़ाई पूरी तरह से ठप्प हो गई है. वो इस बात से चिंतित थीं कि उनके गाँवों में ही नहीं बल्कि पूरे बस्तर में लॉकडाउन और कोरोना की वजह से काफ़ी बड़ी तादाद में बच्चों का स्कूल छूट गया है.

इसके अलावा वो अपने समुदाय की शिक्षा और ख़ासतौर से लड़कियों की पढ़ाई लिखाई के बारे में चिंतित थीं. 

मैंने उनसे पूछा कि कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि वो नाम भर की पंचायत सरपंच हैं. असली काम तो उनके पति ही करते हैं. उन्होंने आत्मविश्वास भरा जवाब दिया था. उन्होंने कहा था, “ हम ख़ुद सक्षम हैं’.

सरपंच साहिबा से लंबी बात हुई और यह बात जितनी आगे बढ़ती गई इस बातचीत में मुझे अहसास होता गया कि औरतों को घर और अपने परिवार के अलावा अपने गाँव और समाज के मसलों, मुश्किलों और संभावित समाधानों का आइडिया ज़्यादा है. 

खाना खाने के बाद जब हम कुछ लोगों से मिल रहे थे तो मैंने देखा कि उन लोगों में वो आदमी भी शामिल है जो हमें नाम से नदी पार करा कर लाया था. मैंने उनसे पूछा कि वो इसी गाँव यानि कंदाड़ी के रहने वाले हैं? उन्होंने कहा, “हाँ और जिन्होंने आपके लिए मुर्ग़ा बनाया है वो मेरी पत्नी है”. मेरे मुँह से निकला था, “मतलब तुम सरपंच के पति हो?” वो हंसता हुआ कहता है पूछ लो सरपंच से.

उन्होंने कहा कि वो नाम चलाते हैं और खेत और जंगल में काम करते हैं. उनकी राजनीति में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है. उनकी पत्नी की है और वो गाँव के मसलों के लिए तहसील से लेकर ज़िले तक जाती रहती है.

ट्राइबल किचन का एक और एपिसोड पूरा हुआ और मेरा यह विश्वास भी बढ़ा कि महिलाएँ अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति अधिक संजीदा रहती हैं.साथ ही यह विश्वास भी और बढ़ा कि यह कार्यक्रम औरतों की नज़र से इस देश और समाज को देखने का एक सही ज़रिया है. 

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