आदिवासी पर उपकार मत कीजिए, अधिकार दीजिए

आदिवासी अधिकारों के मामले में शायद ही किसी पार्टी का रिकार्डिंग बहुत शानदार रहा है. लेकिन बीजेपी का रिकॉर्ड सबसे कमज़ोर है. गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में बीजेपी के लंबे शासनकाल में पेसा 1996 जैसा क़ानून लागू ही नहीं हुआ. गुजरात में 2017 में इस क़ानून से जुड़े नियम बनाए गए. छत्तीसगढ़ में तो कल ही यानि 13 जुलाई 2022 को कांग्रेस की सरकार ने इस क़ानून के नियम लागू किये हैं. मध्य प्रदेश में अभी नियम बनाने का प्रक्रिया पूरी ही नहीं हुई है.

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भारत के राष्ट्रपति के चुनाव 18 जुलाई 2022 को होंगे. बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए ने द्रोपदी मूर्मु को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है. जब से उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम घोषित किया गया है राजनीतिक विमर्श में देश के आदिवासी समुदायों की चर्चा काफ़ी हो रही है. 

यह चर्चा द्रोपदी मूर्मु की पृष्ठभूमि और आदिवासी समुदायों को सम्मान देने के इर्द गिर्द ज़्यादा घूम रही है. इस बहाने आदिवासी समुदायों के अधिकारों की कुछ बातें हुई हैं लेकिन वो बातें भी द्रोपदी मूर्मु की उम्मीदवारी पर सवाल करने के लिए की गई है. 

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने ही सही आदिवासी मसलों पर कुछ चर्चा होना एक सुखद अहसास है. क्योंकि तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया यानि हिंदी और अंग्रेज़ी अख़बार और टीवी चैनल की नज़र देश की लगभग 10 प्रतिशत आबादी की तरफ़ जाती ही नहीं है. 

द्रोपदी मूर्मु के राष्ट्रपति बनने के बाद राष्ट्रीय मीडिया या तथाकथित राजनीतिक डिस्कोर्स में आदिवासी मसलों की उपस्थिति की उम्मीद बेमानी है. यह मानने का भी अभी तो कोई कारण नहीं है कि द्रोपदी मूर्मु राष्ट्रपति बनने के बाद आदिवासी आबादी के लिए कुछ ख़ास करना चाहेंगी. 

द्रोपदी मूर्मु देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति बनने जा रही हैं.

इस मसले पर पहले ही काफ़ी लिखा और बोला जा चुका है. मेरी राय इतनी ही है कि द्रोपदी मूर्मु से ही यह उम्मीद की जाए कि वो लीक से हट कर राष्ट्रपति साबित करने का दावा करें, जायज़ नहीं है. संविधान में राष्ट्रपति पद की एक सीमित और औपचारिक भूमिका है. द्रोपदी मूर्मु भी वही भूमिका निभाएँगी. 

द्रोपदी मूर्मु के राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाए जाने और उनके राष्ट्रपति चुने जाने पर इससे अधिक मुझे कुछ नहीं कहना है. लेकिन इतना ज़रूर कहना है कि राष्ट्रपति के चुनाव से इतर भी आदिवासी मसलों पर राजनीतिक घटनाक्रम चल रहा है.

पिछले कई महीनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा आदिवासी भारत के दौरे पर गए हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा की तरह आदिवासी भारत में बीजेपी के अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं. 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने गुजरात और मध्य प्रदेश में कई बड़ी आदिवासी सभाओं को संबोधित किया है. इन सभाओं में आदिवासी इलाक़ों के लिए कई बड़ी घोषणाएँ की गई हैं. 

कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने भी गुजरात के आदिवासी इलाक़ों में सभाएँ की हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी गुजरात में अपनी पार्टी के प्रचार की शुरुआत करने आदिवासी इलाक़ों में ही पहुँचते हैं. 

आदिवासी आबादी पर फ़ोकस शिफ़्ट होने का कारण

भारतीय जनता पार्टी गुजरात में 1995 से लगातार सत्ता हासिल करती रही है. पिछले 6 विधान सभा चुनाव में बीजेपी सत्ता हासिल करती रही है. गुजरात की कुल 182 विधान सभा सीटों में से बीजेपी 2012 कि विधान सभा चुनाव तक लगातार 100 से ज़्यादा सीटें जीत कर सरकार बनाती रही थी. 

2014 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन कर दिल्ली चले आए. उनके गुजरात छोड़ने के बाद राज्य में 2017 में विधान सभा के चुनाव हुए और बीजेपी को पहली बार 100 से कम सीटें मिलीं. 

बीजेपी के प्रदर्शन में गिरावट की कई वजह हो सकती हैं. लेकिन एक बड़ी वजह थी आदिवासी इलाक़ों में उसको आशा अनुसार सफलता नहीं मिलना. बीजेपी को इस चुनाव में कुल 99 सीट मिली और कांग्रेस पार्टी ने 77 सीटें जीतीं थीं.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी आदिवासी इलाक़ों में सभाएँ कर चुके हैं

गुजरात में विधान सभा की 27 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 2017 के चुनाव में इन 27 आदिवासी सीटों में से बीजेपी को सिर्फ़ 9 सीटें ही मिलीं थीं. जबकि कांग्रेस और उसकी सहयोगी बीटीपी (Bhartiya Tribal Party) ने कुल 17 सीटें जीत ली थीं. 

इसी तरह से अगर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के चुनाव नतीजों का आकलन करते हैं तो पता चलता है कि इन राज्यों में बीजेपी की हार के कारणों में आदिवासी मतदाता का रूठ जाना एक बड़ा कारण है. 

इस पृष्ठभूमि में बीजेपी के लिए ज़रूरी है कि वो आदिवासी इलाक़ों में खोई ज़मीन को वापस हासिल करे और कांग्रेस के लिए चुनौती है कि वो अपनी सफलता को बरकरार रखे.

इसलिए इन दोनों ही दलों की बीच आदिवासी इलाक़ों में ज़ोर आज़माइश स्वभाविक सी बात है. वैसे भी आज की बेजीपी चुनाव से जुड़े आँकड़ों या मसलों को हल्के में नहीं लेती है.

आदिवासी इलाक़ों में खोई ज़मीन पाने के लिए क्या किया गया है

गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तीनों ही राज्यों में आदिवासी आबादी चुनाव में जीते के लिए अहम मानी जाती है. इन तीनों ही राज्यों में बीजेपी का लंबे समय शासन रहा. छत्तीसगढ़ जहां फ़िलहाल कांग्रेस की सरकार है वहाँ भी बीजेपी ने 2003 से 2018 तक यानि 15 साल शासन किया.

इन तीनों ही राज्यों में आदिवासी इलाक़ों और समुदायों के लिए विशेष संवैधानिक और क़ानून प्रावधानों के रिकॉर्ड को देखेंगे तो पता चलेगा कि इस मामले में बीजेपी सरकार ने कोई उत्साह नहीं दिखाया था.

पेसा अधिनियम 1996 (PESA 1996) आदिवासी इलाक़ों के गवर्नेंस में भागीदारी देने के मक़सद से बनाया गया था. इस क़ानून का उद्देश्य आदिवासी परंपरा, सामाजिक व्यवस्था और आधुनिक शासन प्रणाली में तालमेल बैठाना था.

इस क़ानून को लागू करने में बीजेपी शासित तीनों ही राज्यों का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है. छत्तीसगढ़ में बीजेपी के 15 साल के शासन में इस क़ानून से जुड़े नियम नहीं बनाए गए थे. अब कांग्रेस सरकार ने छत्तीसगढ़ में इस क़ानून से जुड़े नियमों को अधिसूचित किया है.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब मुख्यमंत्री थे तो पेसा क़ानून लागू नहीं किया

मध्य प्रदेश में भी आज तक इस क़ानून से जुड़े नियम तैयार नहीं हुए हैं. हालाँकि मध्य प्रदेश में मुख्य मंत्री ने पेसा क़ानून को लागू करने की घोषणा कर दी है. लेकिन 15 साल से ज़्यादा सत्ता में क़ायम बीजेपी या शिवराज सिंह चौहान इस जवाबदेही से कैसे बच सकते हैं कि अब तक इस क़ानून को उस राज्य में ही लागू नहीं किया गया जहां आदिवासी आबादी सबसे अधिक है.

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में अलग अलग राज्यों के आदिवासियों के लिए हज़ारों करोड़ रुपए की योजनाओं का ऐलान किया है. बीजेपी शासित गुजरात में पिछले महीने ही एक सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आदिवासियों के लिए 3050 करोड़ रूपये की योजनाओं की घोषणाएँ की हैं. इसी तरह की घोषणाएँ मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों के आदिवासियों के लिए भी की जा रही हैं.

लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने भी पेसा अधिनियम लागू नहीं किया था. गुजरात में 2017 में पेसा के नियम तैयार किये गए थे. वैसे आदिवासी इलाक़ों में पेसा पूरी तरह से लागू होने का दावा सरकार नहीं कर सकती है. 

इसी तरह से बीजेपी शासित राज्यों में संविधान की अनुसूची 5 के प्रावधानों और वन अधिकार क़ानून 2006 की अवहेलना की शिकायत रही है. बीजेपी ने 2017-2018 के विधान सभा चुनावों में आदिवासी इलाक़ों में झटका खाने के बाद आदिवासियों मतदाता पर फ़ोकस किया है.

इन सभी राज्यों में उसका मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस पार्टी से ही है. कांग्रेस पार्टी की स्थिति बेहद दयनीय है. यह पार्टी जिसके नेतृत्व में पेसा 1996 और वन अधिकार क़ानून 2006 बनाया गया, इस काम का श्रेय लेने की स्थिति में ही नहीं है. 

राजनीतिक ज़ोर आज़माइश या मल्लयुद्ध, जीत हमेशा बलशाली की नहीं होती है, बल्कि दाँवपेंच में माहिर होना भी ज़रूरी है. फ़िलहाल बीजेपी बलशाली भी है और दांव-पेंच में माहिर भी है.

मीडिया का काम सरकार के कामकाज और नागरिकों के अधिकारों की निगरानी का है. इसलिए कहना चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान या फिर भूपेश बघेल और हेमंत सोरेन, आप आदिवासियों पर पैसा बरसाने की घोषणाओं के बजाए पेसा लागू कीजिए. क्योंकि अगर आप आदिवासियों के लिए तैयार किये गए संवैधानिक और क़ानून के प्रावधानों को लागू किया जाता है तो उनके हक़ का पैसा तो उन तक पहुँच ही जाएगा.

आदिवासी आबादी के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार या फिर राज्य सरकारें कितनी गंभीर हैं इस बात का अंदाज़ा लगाने के लिए एक घटना पर नज़र डालिए. साल 2019 के फ़रवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसला सुनाया कि जिन भी आदिवासियों के पास अपना मालिकाना हक़ जताने के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं उन्हें जंगल से बाहर कर दिया जाए.

इस फ़ैसले में कहा गया कि ये लोग नाजायज़ तरीक़े से जंगल में रह रहे हैं और उन्हें अतिक्रमण करने वाला माना गया है. यह फ़ैसला एक वाइल्डलाइफ़ एनजीओ की तरफ़ से दायर याचिका पर आया था. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद 10 लाख आदिवासी परिवारों पर बेघर होने का ख़तरा आ गया था. 

अब यह कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट इतना कठोर फ़ैसला कैसे दे सकता था. इसका कारण ये था कि 16 राज्यों से जुड़े इस मामले में से किसी भी राज्य या फिर केन्द्र सरकार का कोई वकील सुप्रीम कोर्ट में आदिवासियों का पक्ष रखने के लिए मौजूद नहीं था. 

जब इस मसले पर बवाल हुआ और सरकार को लानतें भेजी गईं तो सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से इस फ़ैसले पर रोक लगाने की गुहार लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले पर रोक लगा दी. लेकिन कड़वी सच्चाई ये है कि सरकार के बड़े वकील जो मामूली बातों पर अदालत में झगड़ते दिखाई देते हैं, आदिवासियों के मसले पर अदालत में हाज़िर ही नहीं हुए.

इस मामले में केन्द्र सरकार या किसी राज्य सरकार ने अपने क़ानून विभाग से जवाब माँगा हो और जवाबदेही तय हुई हो ऐसा कोई प्रमाण तो नहीं मिला है.

इसलिए यह ज़रूरी है कि सरकार आदिवासी पर उपकार मत कीजिए, उनका अधिकार दीजिए. 

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