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रतलाम-झाबुआ सीट पर कांग्रेस पड़ेगी भारी, कांतिलाल भूरिया और अनिता नागर सिंह चौहान में मुक़ाबला

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने झाबुआ से लोकसभा चुनाव प्रचार की शुरूआत की है तो उसके राजनीतिक मायने हैं. यह एक प्रतिष्ठित सीट है और यहां से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों तक संदेश जाता है. लेकिन क्या बीजेपी की उम्मीदवार अनीता नागर सिंह चौहान यहां जीत हासिल कर पाएँगी ? पढ़िए

18 मार्च को मध्य प्रदेश के भीलों का सबसे बड़ा पर्व भंगोर्या या भगोरिया की शुरूआत अलीराजपुर ज़िले से हुई. मेला स्थल के अलावा ज़िला बस स्टैंड पर भी ज़बरदस्त समां बंधा था . यहां के परंपरागत भारी भारी ढोल-मांदल और बांसुरी के संगीत पर नाचते आदिवासी युवक मस्ती में थे. 

इस मेले में आई महिलाएं होली की ख़रीदारी में लगी थीं. युवतियां कभी लजाती तो कहीं खिलखिलाती अलग अलग टोलियों में घूम रही थीं. होली से लगने वाले भगोरिया हाट सात दिन तक चलते हैं. इन सात दिनों में झाबुआ, अलीराजपुर, धार, बडवानी, खरगोन ज़िलों में लगने वाले साप्ताहिक हाट छोटे-बड़े मेले में तब्दील हो जाते हैं.

इन ज़िलों में शायद ही कोई आदिवासी होगा जो भगोरिया हाट में शामिल नहीं होता है. इन मेलों में ज़बरदस्त भीड़ रहती है. 2024 के भगोरिया मेले की ख़ास बात ये है कि इसकी शुरूआत और देश में आम चुनाव की घोषणा लगभग साथ साथ हुई है.

मध्य प्रदेश के अलीराजपुर ज़िले के भगोरिया मेलों में चुनाव आयोग ने मतदान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने का प्रचार भी चलाया है. दरअसल चुनाव आयोग ही नहीं इस बार भगोरिया ने रतराम-झाबुआ, खरगोन या फिर धार ज़िले में चुनाव आयोग और राजनीतक दलों दोनों का काम आसान कर दिया. 

क्योंकि चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को ही बिना किसी प्रयास के लाखों लोगों से संपर्क करने का मौका मिल गया. हम लोग 18 मार्च भगोरिया मेला देखने और रिपोर्ट करने के लिए 18 मार्च को झाबुआ पहुंचे थे. लेकिन इस पर्व के साथ साथ लोकतंत्र के पर्व यानि लोकसभा चुनाव के माहौल को समझने का भी मकसद था.

इस कोशिश में जितने भी नेताओं से मिलने के लिए संपर्क किया गया, कोई भी निश्चित समय देने की स्थिति में नहीं था. क्योंकि अगले सात दिन तक उन्हे भगोरिया में लोगों से संपर्क साधना था. इसलिए हमें भी यही लगा कि चुनाव आयोग या राजनीतिक दलों के लिए ही नहीं बल्कि पत्रकारों के लिए भगोरिया हाट एक मौका हो सकता है जहां लोगों के मन को टटोला जा सकता है. इसके अलावा नेताओं से भी यहीं मुलाकात आसान होगी.

अपनी भोगरिया रिपोर्टिंग के दौरान हमें झाबुआ, अलीराजपुर, कठ्ठीवाड़ा और वालपुर के अलावा कुछ छोटे हाटों में जाने का मौका मिला. हमने वापसी रतलाम रेलवे स्टेशन से की थी और यहां पर भी कुछ लोगों से मिलने का अवसर मिला. लोकसभा क्षेत्र के लिहाज से देखा जाए तो हमारी यह यात्रा रतलाम-झाबुआ तक सीमित रही.

झाबुआ से ही मध्य प्रदेश में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत की है. क्योंकि झाबुआ-रतलाम सीट मध्यप्रदेश की सबसे चर्चित सीटों में से एक है. इसके अलावा इस सीट से चुनाव प्रचार की शुरुआत कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर से स्पष्ट किया है कि इस बार के चुनाव में वे आदिवासी वोटबैंक को काफी महत्व दे रहे हैं.

झाबुआ-रतलाम सीट इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यहां से गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के कई आदिवासी बहुल इलाकों में भी माहौल बनता है. इस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार के लिए झाबुआ का चुनना स्वभाविक और समझदारी का काम है.

लेकिन ऐसा लगता है कि 2014 में मोदी लहर पर सवार हो कर कांग्रेस की इस परंपरागत सीट को जीतने वाली बीजेपी झाबुआ-रतलाम लोकसभा क्षेत्र में बीजेपी के लिए जीत हासिल करना बेहद मुश्किल है. इसका एक बड़ा कारण यहां पर उम्मीदवार का चुनाव और जातीय समीकरण हैं. 

अनिता चौहान और कांतिलाल भूरिया के बीच मुकाबला

बीजेपी ने रतलाम झाबुआ लोकसभा सीट से अनीता नागर सिंह चौहान को टिकट दिया है. पार्टी ने यहां पर मौजूदा सांसद गुमान सिंह डामोर का टिकट काट कर उन्हें टिकट दिया है. अनीता नागर सिंह चौहान अलीराजपुर के विधायक और राज्य में मंत्री नागर सिंह चौहान की पत्नी हैं. अनीता सिंह चौहान दूसरी बार अलीराजपुर जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष चुनी गई है.

कांग्रेस पार्टी ने अपने दिग्गज नेता कांतिलाल भूरिया पर दांव खेला है. कांतिलाल भूरिया ने यह सीट 5 बार जीती है. कांतिलाल भूरिया केंद्र मंत्री रहे हैं और राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. 

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी लोकसभा चुनाव में एक मजबूत विकेट पर है. इसके अलावा मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव की घोषणा से बिलकुल पहले विधान सभा चुनाव में मिली जीत भी उसके पक्ष में ही जाती है.

लेकिन इसके बावजूद अनिता नागर सिंह चौहान के लिए लड़ाई आसान नहीं होगी. इसकी एक सबसे बड़ी वजह है कि वे अलीराजपुर ज़िले से हैं. उनके पति बेशक राज्य में कैबिनेट मंत्री हैं और वे खुद भी दूसरी बार ज़िला पंचायत की अध्यक्ष हैं, लेकिन अलिराजपुर के बाहर उनका कम ही प्रभाव है.

झाबुआ ज़िले के एक गांव संदला-कल्याणपुरा में बीजेपी के एक युवा नेता और ज़िला पंचायत सदस्य से बातचीत में ऐसा लगा कि वे अपनी पार्टी की उम्मीदवार के बारे में बहुत उत्साहित नहीं है. अलबत्ता वे अगले दिन मुख्यमंत्री की जनसभा की तैयारी को लेकर ज़्यादा चिंतित थे.

जब हम उनसे पूछा कि वे लोकसभा उम्मीदवार के बारे में क्या राय रखते हैं तो वे बोले,”वे एक दूसरे कोने से आती हैं. अगर झाबुआ-रतलाम बेल्ट से उम्मीदवार दिया जाता तो पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए चुनाव लड़ाना आसान होता. लेकिन अनिता नागर सिंह चौहान को लोग यहां पर पहचानते ही नहीं हैं.”

राज्य के आदिवासी इलाकों में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने में जनजाति सुरक्षा मंच नाम के संगठन ने काफी अहम भूमिका निभाई है. राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (RSS) से जुड़े इस संगठन ने पिछले 5 साल में धर्मातंरण को आदिवासी इलाकों में बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास किया है.

झाबुआ और रतलाम में इस संगठन के कई कार्यकर्ताओं से मुलाकात हुई. इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि संघ की तरफ से उन्हें चुनाव में कोई सीधी ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है. लेकिन दबी ज़बान इस संगठन के ज़्यादातर कार्यकर्ताओं ने यह आशंका ज़ाहिर ज़रुर की थी कि उम्मीदवार का चुनाव बेहतर हो सकता है.

जनजाति सुरक्षा मंच के एक बड़े नेता कैलाश निनामा से रतलाम में लंबी बातचीत हुई. उन्होनें ने कहा कि बीजेपी ने इस चुनाव के उम्मीदवार के चुनाव में दो ग़लतियां की हैं. पहली ग़लती यह हुई कि झाबुआ में भील की बजाए भिलाला समुदाय की महिला को उम्मीदवार बना दिया गया है. दूसरी ग़लती यह हुई कि एक मंत्री की पत्नी को उम्मीदवार बना दिया गया है. यह अच्छा होता अगर पार्टी के किसी कार्यकर्ता को टिकट दिया जाता. 

कांग्रेस में उत्साह

2023 के विधान सभा चुनाव में अलीराजपुर की जोबस सीट से जीतने वाली सेना महेश पटेल के पति और कांग्रेस पार्टी के दिग्गज़ नेता महेश पटेल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत के बारे में आश्वस्त नज़र आ रहे थे. उन्होंने MBB से बात करते हुए कहा, “ जोबट में हम 40 हजार वोट से जीते हैं, अलीराजपुर भी नज़दीकी मुकाबला रहा और झाबुआ में भी हमारी पार्टी का उम्मीदवार जीता है. इस लिहाज से कांग्रेस पार्टी मजबूत है. लड़ाई ज़रूर होगी लेकिन कांग्रेस का पलड़ा भारी है और भारी रहेगा.”

कांतिलाल भूरिया के पुत्र और झाबुआ के विधायक डॉक्टर विक्रांत भूरिया ने दावा किया कि ना सिर्फ़ उनके पिता बल्कि कांग्रेस कई अन्य आदिवासी बहुल सीटों पर जीत दर्ज करेगी. विक्रांत भूरिया मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष हैं. उन्होंने कहा कि बेशक राज्य में बीजेपी ने हमें हरा दिया है, लेकिन लोकसभा चुनाव में हम बाज़ी पलट देंगे. 

जमुना देवी के बाद बन सकती हैं दूसरी महिला सांसद 

रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट पर अब तक केवल एक बार ही महिला सांसद चुनी गई हैं. 1962 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की दिग्गज महिला नेता जमुना देवी ने चुनाव जीता था. वह इस सीट पर एक मात्र महिला सांसद थी.

लेकिन अब बीजेपी ने इस सीट पर अनीता नागर सिंह चौहान को प्रत्याशी बनाया है. ऐसे में अगर वह चुनाव जीतती है तो वह इस सीट पर दूसरी महिला सांसद हो सकती हैं. 

बीजेपी के ज़िला स्तर के कई नेताओं ने बातचीत में कहा कि अनीता नागर सिंह चौहान अलीराजपुर में बेशक मजबूत रहेंगी. लेकिन झाबुआ-रतलाम के इलाके में वे पूरी तरह से पार्टी कार्यकर्ताओं की मेहनत और लगन पर निर्भर करेंगी.

रतलाम-झाबुआ सीट

देश की लगभग नौ प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी समाज के लिए लोकसभा में 47 सीटें आरक्षित हैं. देशभर में आदिवासियों के लिए मध्य प्रदेश में सबसे अधिक लोकसभा सीटें आरक्षित हैं. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में 6 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. जिनमें बैतूल, धार, खरगोन, मंडला, रतलाम और शहडोल शामिल है.

रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से तीन झाबुआ में हैं. ये वो सीट हैं जो 72 सालों में 14 बार कांग्रेस ने जीती हैं. पहले ये सिर्फ झाबुआ सीट कहलाती थी. परिसीमन के बाद इसे झाबुआ-रतलाम कहा जाने लगा.

झाबुआ-रतलाम संसदीय क्षेत्र कांग्रेस की परंपरगत सीट है. रतलाम-झाबुआ एसटी सीट पर हुए 18 चुनावों और उपचुनावों में से कांग्रेस ने 14 बार ये सीट जीती है. जबकि बीजेपी ने दो बार, 2014 और 2019 में ये सीट जीती है.

दशकों से इस सीट पर दो लोगों का दबदबा रहा है…जिनमें दिग्गज आदिवासी नेता दिलीप सिंह भूरिया और कांतिलाल भूरिया का नाम शामिल है.

दिलीप सिंह भूरिया, जिन्होंने कांग्रेस के लिए पांच बार सीट जीती और आखिरी बार 2014 में बीजेपी की टिकट पर इस सीट को जीता. क्योंकि कांतिलाल भूरिया और दिग्विजय सिंह की राजनीति का शिकार हुए दिलीप सिंह बाद में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में चले गए.

दिलीप सिंह भूरिया के बीजेपी में जाने के बाद 1998 से 2019 तक पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व राज्य कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया इस सीट से 5 बार सांसद रहे.

2014 में मोदी लहर में वो चुनाव हार गए. उन्हें बीजेपी के दिलीप सिंह भूरिया ने 1 लाख से ज़्यादा वोटों को हराया. लेकिन एक साल के अंदर ही 2015 में बीजेपी सांसद दिलीप सिंह भूरिया का निधन हो गया. सीट के लिए उपचुनाव हुआ और कांतिलाल भूरिया फिर चुनाव जीत गए. उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया ने बीजेपी की प्रत्याशी और दिलीप सिंह भूरिया की बेटी निर्मला भूरिया को 88 हजार वोटों से हराया.

झाबुआ-रतलाम संसदीय सीट 3 जिलों झाबुआ, अलीराजपुर और रतलाम को मिलाकर बनायी गई है.

अलीराजपुर ज़िले की अलीराजपुर, जोबट विधानसभा सीट; झाबुआ ज़िले की झाबुआ, थांदला, पेटलावद विधानसभा सीट; रतलाम ज़िले की रतलाम ग्रामीण, रतलाम शहर, सैलाना विधानसभा शामिल हैं.

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