कोरकु कुचिर : कोया आदिवासी परिवार के साथ देसी चिकन की दावत

इस विधि से पकाए गए मुर्ग़े को कोरकु कुचिर कहा जाता है. इस विधि में सबसे पहले देसी मुर्ग़े को अच्छे से साफ़ किया जाता है. उसके बाद कढ़ाई को आग पर चढ़ाने से पहले ही उसमें तेल और मसलों के साथ मिक्स कर दिया गया.

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ओडिशा के मलकानगिरी ज़िले के एक छोटे से गाँव रंगमाटियागुड़ा में कोया आदिवासी रहते हैं. कोया आदिवासियों को सरकार ने पीवीटीजी की श्रेणी में रखा है. इसका मतलब ये है कि यह आदिवासी समुदाय विकास के क्रम में पीछे रह गया है.

इसकी कई वजह हो सकती हैं. सरकार ने किसी आदिवासी समुदाय को इस श्रेणी में रखने के कुछ मापदंड तय किये हैं. मसलन जो आदिवासी समुदाय अभी भी मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज से थोड़ा दूर हैं. साक्षरता और विकास के दूसरे पैमानों पर काफ़ी पीछे हैं और जीविका के साधन पुरातन हैं. यानि जो अभी भी जंगल के सहारे ही ज़्यादा जीते हैं.

इन आदिवासियों से मिलने हम रंगमाटिया पहुँचे तो इनके जीवन के कई पहलुओं को देखने और कुछ हद तक समझने का मौक़ा मिला. इस गाँव में जब हम पहुँचे तो लोगों में हमसे मिलने में शुरुआती झिझक ज़रूर थी. लेकिन एक बार बातचीत शुरू हुई तो फिर लंबी चली.

औरतों भी बातचीत में शामिल हो गई थीं. हालाँकि औरतों की बातचीत को समझने के लिए हमें अपने कुछ दोस्तों का सहारा लेना पड़ा. क्योंकि औरतें स्थानीय भाषा में बात कर रहीं थी.

इस बातचीत में उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बारे में भी बात हुई. गाँव के बच्चों से भी तो मुलाक़ात हुई थी. बच्चों की अपनी ही बातें थीं. इस मज़ेदार बातचीत में कई ज़रूरी मसले भी समाने आए.

मसलन अभी भी स्कूल और पढ़ाई की तरफ़ इन बच्चों का या उनके परिवारों का झुकाव कम ही नज़र आया. बच्चे दिन भर जंगल में भटकते हैं. शाम को कुछ चूहे या कोई छोटा मोटा जानवर पकड़ लाते हैं तो माँ पका कर खाने को दे देती है.

रंगमाटिया में लोगों से बात करते करते कब शाम हो गई पता ही नहीं चल पाया.

इसके बाद तय यह हुआ कि हम इसी गाँव में खाना खाएँ. रात का खाना ओरैइ मड़कामी ने बनाया था. उनके परिवार ने हमारी टीम के लिए अपनी परंपरागत विधि से देसी मुर्ग़ा पकाया.

इस विधि से पकाए गए मुर्ग़े को कोरकु कुचिर कहा जाता है. इस विधि में सबसे पहले देसी मुर्ग़े को अच्छे से साफ़ किया जाता है. उसके बाद कढ़ाई को आग पर चढ़ाने से पहले ही उसमें तेल और मसलों के साथ मिक्स कर दिया गया.

इसके बाद थाली से ढक कर कढ़ाई को आग पर चढ़ा दिया गया. क़रीब 10 मिनट बाद थाली हटा कर उसे अच्छे से उल्टी-पल्ट कर दिया गया. जब मसाला और तेल अलग हो गया तो उसमें थोड़ा पानी डाल दिया गया.

फिर क़रीब 45 मिनट तक इस चिकन को अच्छे से उबाला गया. बीच बीच में चिकन को हिलाया गया जिससे कढ़ाई से चिकन चिपक ना जाए. इसके बाद हमने ओरैइ मड़कामी के परिवार के साथ इस चिकन का आनंद लिया.

इस गाँव में बिताए समय और बातचीत के आधार पर जल्दी ही आप एक ग्राउंड रिपोर्ट देख और पढ़ पाएँगे. फ़िलहाल इस चिकन का आनंद लीजिए, जिसका वीडियो आप उपर क्लिक करके देख सकते हैं.

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