बोंडा आदिवासी : पहचान बचाए या ज़िंदगी

बोंडा समुदाय का बाहरी लोगों से मेल मुलाक़ात का उनकी परंपरा, जीवनशैली और भाषा बोली पर ज़ाहिर असर पड़ा है. औरतों के लिबास और भाषा पर भी यह असर देखा जा सकता है. इस मेल मिलाप की वजह से बोंडा संस्कृति पर पड़ रहे असर के अलावा कई बार यह चिंता भी ज़ाहिर की जाती है बाहरी दुनिया के समाज में बोंडाओं के साथ असमानता बरती जाएगी और उनका शोषण हो सकता है.

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क़रीब 5 साल बाद हम एक बार फिर ओडिशा के मलकानगिरी ज़िले की बोंडा घाटी पुहँचे थे. यहाँ के हालातों में कोई ऐसा फ़र्क़ नज़र नहीं आ रहा था जिसे कह सकूँ कि यह एक बदलाव है. अभी गाँव में वैसी ही ख़ामोशी है, जिसे बीच बीच में मुर्ग़े की बागं तोड़ती है.

गाँव का चापाकल सूख गया है और औरतें पानी ढोने में अपना समय खपा रही हैं. बोंडा डेवलपमेंट एजेंसी के अफ़सर ने जो दावे 5 साल पहले हमारे कैमरे पर किए थे, वो धराशायी थे. वैसे उन्होंने यह सोचा भी तो नहीं होगा कि 5 साल बाद हम लौट कर यहाँ आ जाएँगे. और हम आ भी गए तो आसमान तो टूट नहीं पड़ेगा. 

पहले भी कितने आए और कितने गए. केंद्र सरकार के 40 मंत्रालयों और बोंडा डेवलपमेंट एजेंसी ने बोंडा घाटी के आदिवासियों की ज़िंदगी में बदलाव लाने के लिए क्या क्या किया, उसमें पारदर्शिता या फिर जवाबदेही की उम्मीद रखना अब शायद बेमानी हो चुका है.

सब कुछ ठहरा हुआ नज़र आता है. लेकिन कहा तो यह जाता है कि बदलाव को रोका नहीं जा सकता. ज़िंदगी में एक ही चीज़ स्थाई है और वो है बदलाव. तो क्या बोंडा घाटी में यह कहावत या सत्य भी काम नहीं करता है ?

इसे समझने के लिए इस खामोशी और ठहराव की परत के नीचे झांकना पड़ता है. यहाँ के लोगों से लंबी बातें होती हैं तो पता चलता है कि पहाड़ी बोंडा एक भारी जद्दोजहद में है जिसके एक तरफ़ उसकी पहचान है और एक तरफ़ उसकी जान है. उसके सामने एक बड़ा सवाल है पहचान बचाए या ज़िंदगी.

बोंडा समुदाय को मातृ सत्तात्मक समाज माना जाता है. यानि इस समाज में परिवार का वंश औरतों के नाम से चलता है और इनका समाज में अहम रोल माना जाता है. इस बात को आगे बढ़ाने से पहले यह समझ लेना ज़रूरी है कि बोंडा समुदाय में भी अब दो समूह बन चुके हैं. एक समूह है पहाड़ी बोंडा या अपर बोंडा और दूसरा समूह है मैदानी यानि लोअर बोंडा.

इनकी कुल आबादी 12000 बताई जाती है. इनमें से क़रीब 8000 पहाड़ी बोंडा और 4000 मैदानी बोंडा. बोंडा घाटी में पहाड़ी बोंडाओं के 30 गाँव हैं. पहाड़ियों के दुर्गम इलाक़ों में बसे इन गाँवों के आदिवासियों के बारे में कहा जाता है कि ये अपनी वेशभूषा, परंपरा और जीवनशैली को बचाए हुए हैं. 

पहाड़ी बोंडाओ को दुनिया में अगर जाना गया है तो उसका एक बड़ा कारण इस समुदाय की औरतों की वेशभूषा इसका एक बड़ा कारण है. पहाड़ी बोंडा औरतें अपना सिर मुंडवा कर रखती हैं. इसके अलावा इनके गले की चाँदी या लोहे की हसली और मालाओं ने दुनिया भर का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा है.

ये औरतें हाथ से बुना हुआ रिंगा अपनी कमर से बांधती हैं. आजकल एक कपड़ा अपनी पीठ को ढँकने के लिए अपने गले से बांध लेती हैं, जिसे यह औरतें लुगड़ा कहती हैं. कानों में बड़े बड़े झुमके भी पहनती हैं. दुनिया भर के फ़ोटोग्राफ़र्स और यात्रा वृतांत लिखने वालों का ध्यान इन औरतों की वेशभूषा ने खींचा है. 

इस आदिवासी समुदाय पर रिसर्च करने वाले लोगों ने कई शोधपत्रों में अब इन औरतों के परंपरागत आभूषणों और ख़ासतौर से रिंगा के ग़ायब होने पर चिंता भी ज़ाहिर की है. यह चिंता कितनी वाजिब है यह बहस का विषय है लेकिन हमने बोंडगुड़ा और कई और गाँवों में यह पाया कि अभी भी बड़ी संख्या में बोंडा औरतें अपनी परंपरागत वेशभूषा में मिलती हैं. रिंगा का चलन कम हुआ है लेकिन पूरी तरह से ग़ायब नहीं है. 

कई मायनों में औरतें पहाड़ी बोंडा समुदाय में समाज की धुरी नज़र आती हैं. आर्थिक या सामाजिक, जिस भी नज़रिए से देखें तो औरतें इस समाज में बेहद अहम रोल निभाती हैं. बोंडा समुदाय की भाषा रेमो का वजूद आज बचा हुआ है तो उसे औरतों ने ही बचाया है.

हालाँकि यहाँ यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि कई बार यह महसूस होता है कि बोंडा औरतें इस समुदाय की रूढ़ियों की जकड़ में फँसी हैं. जिस पर शायद विस्तृत चर्चा की ज़रूरत है. बोंडा समाज के आर्थिक पक्ष को देखेंतो तो उसके केंद्र में भी औरत ही नज़र आती है. बोंडा समुदाय में परिवार में बच्चे पालने, खाना जुटाने से लेकर खेत और जंगल में काम करने तक सब उसकी ज़िम्मेदारी है. यहाँ तक कि शराब बनाने का काम भी उसी के हिस्से में आता है. 

लेकिन हम  बोंडा घाटी में लोगों से मिले तो एक धारणा टूटी कि यह आदिवासी बाहरी दुनिया से कोई मतलब नहीं रखना चाहते हैं. इस समुदाय के लोग मर्द ही नहीं बल्कि औरतें भी अब बाहरी दुनिया से मेल मुलाक़ात बढ़ा रहे हैं. 

जहां मर्द रोज़गार की तलाश में ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के शहरों का रूख करते हैं. महिलाएँ भी आस-पास के गाँवों और शहरों में मज़दूरी के लिए पहुँच रही हैं. खैरापुट ब्लॉक और आस पास के इलाक़ों के हाटों में तो इन महिलाओं की उपस्थिति अब रेगुलर है. पहाड़ी बोंडाओँ का बाहरी समुदायों और समाजों से बढ़ते मेल मिलाप की एक वजह है ख़ुद को ज़िंदा रखने का संघर्ष. पारंपरिक खेती और जंगल के भरोसे अब उनकी ज़रूरतें पूरी होना असंभव है. 

इसलिए उन्हें रोज़गार के नए अवसर तलाशने ही होंगे, जो बोड़ा घाटी में तो उपलब्ध नहीं करा जा सके हैं. बोंडा समुदाय का बाहरी लोगों से मेल मुलाक़ात का उनकी परंपरा, जीवनशैली और भाषा बोली पर ज़ाहिर असर पड़ा है. औरतों के लिबास और भाषा पर भी यह असर देखा जा सकता है. इस मेल मिलाप की वजह से बोंडा संस्कृति पर पड़ रहे असर के अलावा कई बार यह चिंता भी ज़ाहिर की जाती है बाहरी दुनिया के समाज में बोंडाओं के साथ असमानता बरती जाएगी और उनका शोषण हो सकता है. 

ये आशंका जायज़ हैं, लेकिन मुझे लगता है कि अब समय कि बोंडाओँ का मुख्यधारा में शोषण ना हो इस बात पर नज़र रखी जाए, चर्चा की जाए, लेकिन पहाड़ी बोंडा समाज में आ रहे बदलाव को तो अब रोकना लगभग असंभव है. यह बदलाव बेशक मजबूरी में ही आ रहा है…

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